तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ४ (समग्र तत्त्व) को जिस शक्ति से विकल्प विरहित केवल संवित् रूप में परमेश्वर धारण करते हैं, दर्शन करते हैं और प्रकाशित करते हैं वह उनकी श्री पराशक्ति हैं। जिस शक्ति से दर्पण में स्थित हस्ती के समान भेदाभेद रूप में भासित करते हैं वह उनकी श्री मदपरा शक्ति हैं। जिस शक्ति से परस्पर पृथग् रूप में अर्थात् परस्पर भेद से प्रकाशित करते हैं वह उनकी श्रीमदपरा शक्ति हैं। इन त्रिविध को जिस शक्ति के द्वारा धारण किया जाता है अर्थात् अपने स्वरूप में ही स्थापित करते हुए अनुसंधानात्मक व्यापार से ग्रसते हैं वह उनकी भगवती श्रीपरा शक्ति ही श्रीमातृसद्भाव कालकर्षिणी आदि अन्य शब्दों से वर्णित की जाती हैं। इन चार शक्तियों के प्रत्येक स्व- तन्त्रतावश तीन तीन रूप से उदित होती है। अतः सृष्टि स्थिति तथा संहार में ये बारह १ बनती हैं। जैसे— १. संवित् पहले भाव को अन्तः ही कलना करती है, २. इसके अनन्तर बाहर स्फुट रूप से कलना करती है, ३. बाहर ही उसे रंजनात्मक रूप से ग्रहण करने बाद उस भाव को अन्तः संहार करने की अभिलाषा से कलना करती है, १. परम संवित् रूप प्रमाता भेदरूप इन्धन के दहन करने के कारण अग्निरूपी है। वे स्वरूपतः अहं प्रतीति मात्र है जो अपने स्वातन्त्र्य से बुद्धि मन और दस इन्द्रिय के रूप धारण कर द्वादश भाव से स्फुरित होते हैं। प्रमाता जो अग्निरूपी है वही प्रमाणरूप स्थिति प्राप्त करते हैं—उस समय उन्हें सूर्य कहते हैं—अहंकार ही उनके उस समय का रूप है। जिसे हम प्रमाण कहते हैं वह प्रमाता का ही बाहरी रूप है। अब प्रमेय की बात है। प्रमाण बिना किस आधार के प्रमाण नहीं कहलायेगा। अतः सूर्य ही सोम अर्थात् मेयरूपी विश्व का रूप धारण करता है। प्रमाता से प्रमेय तक की स्थितियों में प्रत्येक के चार-चार क्रम हैं जो सृष्टि, स्थिति, संहार और अनाख्या नाम से परिचित है इसलिए उनकी संख्या कुल बारह है। ये जो भासनाएँ हैं वे संवित् की ही भासना है। अतः बोधभूमि में संचरणशील योगी किसी भी स्थिति में इन चारों का अनुसन्धान करते हुए उसमें तल्लीन हो सकते हैं।