तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआ. ४ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ३३ ४. तदनन्तर उसके उपसंहरण के विघ्नरूपी शंका का निर्माण करती है, उसका संहरण भी करती है, ५. शंका के अंश जो ग्रसित हो चुका है भाव के उस भाग को अपने स्वरूप में संहरण से कलना करती है, ६. यह जो उपसंहार करनेवाला है यह मेरा ही स्वरूप है इस प्रकार से भी अपने स्वभाव की कलना करती है, इसके अनन्तर उपसंहार करनेवाले के स्वभाव की कलना में किसी भाव को वासना रूप में स्थापित करती है और किसी भाव को संवित् मात्रा शेष रूप से कलना करती है, ८. इसके बाद स्वरूप की कलना के अनन्तर उत्पन्न करणचक्र की कलना करती है, ९. इसके उपरान्त करणेश्वर की कलना भी करती है, १०. इसके बाद कल्पित मायिक प्रमाता रूप की भी कलना करती है, ११. तब संकोच त्याग के प्रति उन्मुखता और विकास रूप चमत्कार रस के आस्वादन करनेवाले प्रमाता रूप की कलना करती है । १२. इसके बाद ( प्रमाता के ) विकसित स्वरूप की भी कलना करती है । अतः भगवती संवित् देवियाँ सब प्रमाताओं के प्रति अथवा किसी एक प्रमाता के प्रति दो या तीन आदि के क्रम से या अक्रम से उदित होती है और चक्र के सदृश आवर्तित होती रहती हैं । बाहर भी मास, कला, राशि के क्रम से और भीतर घट पटादि के क्रम से भी आभासित होती हैं, इस प्रकार भासित होती हुई चक्रेश्वर की स्वतन्त्रता का पोषण करती हैं इसलिए वे श्रीकाली १ शब्दवाच्या हैं । कलना का अर्थ गति, १. यहाँ जो कलना की चर्चा हुई उसके विभिन्न प्रकार के अर्थ हैं जो ग्रन्थकार ने अपने तन्त्रालोक में स्पष्ट किया है । कलना करने वाली संवित् को काली कहते हैं । इन कालियों की संख्या बारह हैं जो भिन्नप्रकार हैं—१ सृष्टि- काली, २. स्थितिकाली, ३. संहारकाली, ४. रक्तकाली, ५. स्वकाली ( सुकाली ), ६. यमकाली, ७. मृत्युकाली, ८. रुद्रकाली ( भद्रकाली ), ३