तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ४ क्षेप, ज्ञान, भोगीकरण, शब्दन, स्वात्मलयीकरण हैं। इस विषय में भूतिराज गुरु का कथन है— ‘क्षेप और ज्ञान के कलना के कारण काली इत्यादि’ यही अर्थ मेरे द्वारा विरचित विभिन्न ग्रन्थ जैसे विवरण और प्रकरण- स्तोत्र आदि में विस्तृत रूप से देखने योग्य हैं। गम्भीर बातें एक जगह नहीं खोल देना चाहिए, सर्वथा उसका गोपन भी नहीं करना चाहिए— यही हमारे गुरुचरणों का निर्देश है। अतः याग होम आदि के विषयों में जो कुछ कहा गया है वह इस प्रकार महेश्वर स्वरूप में ही स्थित है, ऐसा जानना चाहिए। जो वस्तु हेय है सभी लोग उसे ही उपादेय भूमिका के रूप में ग्रहण करते हैं, और विष्णु से लेकर शिव तक सभी को परमशिव रूप में देखते हैं, ऐसी मिथ्यादृष्टि अनुत्तर योगी के द्वारा सर्वथा त्याज्य है। विद्याधिपति ने इसलिए अपने अनुभव स्तोत्र में विशेष विचार किया है। इस प्रकार याग से योग तक पाँचों विषय पृथक्-पृथक् रूप में नाना प्रकार है अतः उनमें जैसे सुदृढ़ निष्ठा उत्पन्न हो वैसा आचरण ( अभ्यास ) करना चाहिए। यह भक्ष्य है और यह अभक्ष्य तथा यह शुद्ध है और यह अशुद्ध है इस प्रकार विचारों से जो वस्तुओं का सहज धर्म नहीं है और कल्पना मात्र ही उनका वास्तविक तथ्य या सार है आत्मा ( शरीर ) का क्लेश उत्पन्न नहीं करना चाहिए—श्रीपूर्व आदि ग्रन्थों में ऐसा कहा गया है। शुद्धि नीलत्व धर्म के सदृश वस्तु का धर्म नहीं है, अन्य स्थलों में उसी की अशुद्धता का निर्देश दिया गया है—जैसे ९. परमार्ककाली, १०. मार्तण्ड काली, ११. कालाग्नि रुद्रकाली, १२. महा- काली ( पराकाली, महाकाल काली, कालकाली ), यह जो काली की कलना आदि की बातें कही गयी हैं वह प्रमेय, प्रमाण और प्रमाता के साथ सम्बन्धित है और प्रमेय, प्रमाण और प्रमाता के प्रत्येक स्थिति सृष्टि, स्थिति, संहार और अनाख्यारूपी हैं इसलिए संविद् देवियों की कुल संख्या बारह है। वास्तव में कोई भी वस्तु अपने से भिन्न न होते हुए भी अपनी स्वतन्त्रता से उसे बाहर अवभासित करता है, ऐसा करना ही सृष्टि है। उसी प्रकार प्रमाता से अभिन्न जो संवित् है वह प्रमाण दशा को प्राप्त करती हुई प्रमेय बन जाती है।