तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
३२ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ४ (समग्र तत्त्व) को जिस शक्ति से विकल्प विरहित केवल संवित् रूप में परमेश्वर धारण करते हैं, दर्शन करते हैं और प्रकाशित करते हैं वह उनकी श्री पराशक्ति हैं। जिस शक्ति से दर्पण में स्थित हस्ती के समान भेदाभेद रूप में भासित करते हैं वह उनकी श्री मदपरा शक्ति हैं। जिस शक्ति से परस्पर पृथग् रूप में अर्थात् परस्पर भेद से प्रकाशित करते हैं वह उनकी श्रीमदपरा शक्ति हैं। इन त्रिविध को जिस शक्ति के द्वारा धारण किया जाता है अर्थात् अपने स्वरूप में ही स्थापित करते हुए अनुसंधानात्मक व्यापार से ग्रसते हैं वह उनकी भगवती श्रीपरा शक्ति ही श्रीमातृसद्भाव कालकर्षिणी आदि अन्य शब्दों से वर्णित की जाती हैं। इन चार शक्तियों के प्रत्येक स्व- तन्त्रतावश तीन तीन रूप से उदित होती है। अतः सृष्टि स्थिति तथा संहार में ये बारह १ बनती हैं। जैसे— १. संवित् पहले भाव को अन्तः ही कलना करती है, २. इसके अनन्तर बाहर स्फुट रूप से कलना करती है, ३. बाहर ही उसे रंजनात्मक रूप से ग्रहण करने बाद उस भाव को अन्तः संहार करने की अभिलाषा से कलना करती है, १. परम संवित् रूप प्रमाता भेदरूप इन्धन के दहन करने के कारण अग्निरूपी है। वे स्वरूपतः अहं प्रतीति मात्र है जो अपने स्वातन्त्र्य से बुद्धि मन और दस इन्द्रिय के रूप धारण कर द्वादश भाव से स्फुरित होते हैं। प्रमाता जो अग्निरूपी है वही प्रमाणरूप स्थिति प्राप्त करते हैं—उस समय उन्हें सूर्य कहते हैं—अहंकार ही उनके उस समय का रूप है। जिसे हम प्रमाण कहते हैं वह प्रमाता का ही बाहरी रूप है। अब प्रमेय की बात है। प्रमाण बिना किस आधार के प्रमाण नहीं कहलायेगा। अतः सूर्य ही सोम अर्थात् मेयरूपी विश्व का रूप धारण करता है। प्रमाता से प्रमेय तक की स्थितियों में प्रत्येक के चार-चार क्रम हैं जो सृष्टि, स्थिति, संहार और अनाख्या नाम से परिचित है इसलिए उनकी संख्या कुल बारह है। ये जो भासनाएँ हैं वे संवित् की ही भासना है। अतः बोधभूमि में संचरणशील योगी किसी भी स्थिति में इन चारों का अनुसन्धान करते हुए उसमें तल्लीन हो सकते हैं।
आ. ४ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ३३ ४. तदनन्तर उसके उपसंहरण के विघ्नरूपी शंका का निर्माण करती है, उसका संहरण भी करती है, ५. शंका के अंश जो ग्रसित हो चुका है भाव के उस भाग को अपने स्वरूप में संहरण से कलना करती है, ६. यह जो उपसंहार करनेवाला है यह मेरा ही स्वरूप है इस प्रकार से भी अपने स्वभाव की कलना करती है, इसके अनन्तर उपसंहार करनेवाले के स्वभाव की कलना में किसी भाव को वासना रूप में स्थापित करती है और किसी भाव को संवित् मात्रा शेष रूप से कलना करती है, ८. इसके बाद स्वरूप की कलना के अनन्तर उत्पन्न करणचक्र की कलना करती है, ९. इसके उपरान्त करणेश्वर की कलना भी करती है, १०. इसके बाद कल्पित मायिक प्रमाता रूप की भी कलना करती है, ११. तब संकोच त्याग के प्रति उन्मुखता और विकास रूप चमत्कार रस के आस्वादन करनेवाले प्रमाता रूप की कलना करती है । १२. इसके बाद ( प्रमाता के ) विकसित स्वरूप की भी कलना करती है । अतः भगवती संवित् देवियाँ सब प्रमाताओं के प्रति अथवा किसी एक प्रमाता के प्रति दो या तीन आदि के क्रम से या अक्रम से उदित होती है और चक्र के सदृश आवर्तित होती रहती हैं । बाहर भी मास, कला, राशि के क्रम से और भीतर घट पटादि के क्रम से भी आभासित होती हैं, इस प्रकार भासित होती हुई चक्रेश्वर की स्वतन्त्रता का पोषण करती हैं इसलिए वे श्रीकाली १ शब्दवाच्या हैं । कलना का अर्थ गति, १. यहाँ जो कलना की चर्चा हुई उसके विभिन्न प्रकार के अर्थ हैं जो ग्रन्थकार ने अपने तन्त्रालोक में स्पष्ट किया है । कलना करने वाली संवित् को काली कहते हैं । इन कालियों की संख्या बारह हैं जो भिन्नप्रकार हैं—१ सृष्टि- काली, २. स्थितिकाली, ३. संहारकाली, ४. रक्तकाली, ५. स्वकाली ( सुकाली ), ६. यमकाली, ७. मृत्युकाली, ८. रुद्रकाली ( भद्रकाली ), ३
३४ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ४ क्षेप, ज्ञान, भोगीकरण, शब्दन, स्वात्मलयीकरण हैं। इस विषय में भूतिराज गुरु का कथन है— ‘क्षेप और ज्ञान के कलना के कारण काली इत्यादि’ यही अर्थ मेरे द्वारा विरचित विभिन्न ग्रन्थ जैसे विवरण और प्रकरण- स्तोत्र आदि में विस्तृत रूप से देखने योग्य हैं। गम्भीर बातें एक जगह नहीं खोल देना चाहिए, सर्वथा उसका गोपन भी नहीं करना चाहिए— यही हमारे गुरुचरणों का निर्देश है। अतः याग होम आदि के विषयों में जो कुछ कहा गया है वह इस प्रकार महेश्वर स्वरूप में ही स्थित है, ऐसा जानना चाहिए। जो वस्तु हेय है सभी लोग उसे ही उपादेय भूमिका के रूप में ग्रहण करते हैं, और विष्णु से लेकर शिव तक सभी को परमशिव रूप में देखते हैं, ऐसी मिथ्यादृष्टि अनुत्तर योगी के द्वारा सर्वथा त्याज्य है। विद्याधिपति ने इसलिए अपने अनुभव स्तोत्र में विशेष विचार किया है। इस प्रकार याग से योग तक पाँचों विषय पृथक्-पृथक् रूप में नाना प्रकार है अतः उनमें जैसे सुदृढ़ निष्ठा उत्पन्न हो वैसा आचरण ( अभ्यास ) करना चाहिए। यह भक्ष्य है और यह अभक्ष्य तथा यह शुद्ध है और यह अशुद्ध है इस प्रकार विचारों से जो वस्तुओं का सहज धर्म नहीं है और कल्पना मात्र ही उनका वास्तविक तथ्य या सार है आत्मा ( शरीर ) का क्लेश उत्पन्न नहीं करना चाहिए—श्रीपूर्व आदि ग्रन्थों में ऐसा कहा गया है। शुद्धि नीलत्व धर्म के सदृश वस्तु का धर्म नहीं है, अन्य स्थलों में उसी की अशुद्धता का निर्देश दिया गया है—जैसे ९. परमार्ककाली, १०. मार्तण्ड काली, ११. कालाग्नि रुद्रकाली, १२. महा- काली ( पराकाली, महाकाल काली, कालकाली ), यह जो काली की कलना आदि की बातें कही गयी हैं वह प्रमेय, प्रमाण और प्रमाता के साथ सम्बन्धित है और प्रमेय, प्रमाण और प्रमाता के प्रत्येक स्थिति सृष्टि, स्थिति, संहार और अनाख्यारूपी हैं इसलिए संविद् देवियों की कुल संख्या बारह है। वास्तव में कोई भी वस्तु अपने से भिन्न न होते हुए भी अपनी स्वतन्त्रता से उसे बाहर अवभासित करता है, ऐसा करना ही सृष्टि है। उसी प्रकार प्रमाता से अभिन्न जो संवित् है वह प्रमाण दशा को प्राप्त करती हुई प्रमेय बन जाती है।
आ. ४ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ३५ दान दीक्षित पुरुष के लिए—प्रवर्तक वाक्य से ( दान ) वहाँ अशुद्धता का निर्देश हुआ ऐसा कहा जाय, अन्य प्रकार प्रवर्तक वाक्य से ( जो शिव के द्वारा कहा गया है ) तुल्य हो जाता है, इस प्रकार दूसरा प्रवर्तक वाक्य असत् ( अलीक ) है और उस प्रकार वाक्य बाध दोष से बाधित है—ऐसा कहा जाय तो यह ठीक नहीं क्योंकि शिव के द्वारा कथित वाक्य ही अन्य प्रवर्तक वाक्यों का बाधक है जो युक्तिसिद्ध है और सर्वज्ञानोत्तर आदि अनन्त प्रकार आगमों के द्वारा प्रमाणित हैं—इस विषय में आगे आलोचना करेंगे। अतः वैदिक से आरम्भ कर पारमेश्वर सिद्धान्त रूपी तन्त्र जैसे कुलोच्छुष्मादि शास्त्रों में कथित जो नियमरूपी विधि या निषेधात्मक बातें हैं वे सभी यहाँ अकिञ्चित्कर हैं ! श्रीपूर्व आदि ग्रन्थों में ऐसा ही कहा गया है—इसका विस्तृत विवरण तन्त्रालोक में अन्वेषण करना चाहिए। × × × मैं जड़ हूँ, कर्मपाश से बद्ध हूँ, मलिन हूँ, दूसरे के द्वारा संचलित होता हूँ पशु जीव का इस प्रकार जो निश्चय है इसके विपरीत सुदृढ़ निश्चयात्मक निष्ठा की प्राप्तिरूपी सिद्धि आने पर वह उसी क्षण विश्वशरीर चिदात्मक पतिस्वभाव को प्राप्त करता है । इस प्रकार निश्चय जैसे आ सकता है पर योगी सतत उस प्रकार अनुसन्धान के लिए अवहित रहे । वस्तु के यथार्थरूप से हीन जो दृष्टि है उससे शंकित होना नहीं चाहिए अर्थात् सन्देह में नहीं पड़ना चाहिए न तो मूढ़ों के उपदेशों से भ्रमित होना चाहिए । × × × किसी का अध्यवसाय जैसे-जैसे स्फुट होता जायगा, उसका प्रभाव भी तब उसी प्रकार होगा ॥ × × × मैं मलिन हूँ, मैं पशु हूँ, अथवा मैं सब भावमण्डल से भिन्न हूँ, इस प्रकार दृढ़ निश्चय ने जिसके हृदय को मलिन कर रखा है उसमें कैसे परत्व का प्रतिभास होगा ? × × × परम शिवरूपी सूर्य किरणों से जिसके हृदय कमल तीव्र शक्तिपात
३६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ४ के द्वारा खिल उठा है उसमें ही रहस्य सहित बोधक्रम में मनोहर परिमल खिलता है । × × × मैं ही शिवनाथ हूँ अशेष जीव और तत्त्वों के परम विश्राम हूँ ऐसा नदन करता हुआ विमर्शरूपी भ्रमर प्रकाशरूप अपने लक्ष्य को धारण करता है । × × × श्री अभिनव गुप्ताचार्य विरचित तन्त्रसार के शाक्तोपाय प्रकाशन नाम चतुर्थ आह्निक है ।
अथ पञ्चममाह्निकम् अथाणवोपायः तत्र यदा विकल्पः स्वयमेव संस्कारम् आत्मनि उपायान्तरनिरपेक्षत- यैव कर्तुं प्रभवति, तदा असौ पाशवव्यापारात् प्रच्युतः शुद्धविद्यानुग्रहेण परमेशशक्तिरूपताम् आपन्न उपायतया अवलम्ब्यमानः शाक्तं ज्ञानम् आविर्भावयति। तदेतच्च निर्णीतम् अनन्तर एव आह्निके। यदा तु उपा- यान्तरम् असौ स्वसंस्कारार्थं विकल्पोऽपेक्षते, तदा बुद्धिप्राणदेहघटादि- कान् परिमितरूपान् उपायत्वेन गृह्णन् अणुत्वं प्राप्त आणवं ज्ञानम् आविर्भावयति, तत्र बुद्धिः ध्यानात्मिका, प्राणः स्थूलः सूक्ष्मश्च; आद्य उच्चारणात्मा, उच्चारणं च नाम पञ्च प्राणाख्या वृत्तयः, सूक्ष्मस्तु वर्ण- शब्दवाच्यो वक्ष्यते, देहः संनिवेशविशेषात्मा करणशब्दवाच्यः, घटादयो- बाह्याः कुम्भस्थण्डिललिङ्गपूजाद्युपायतया कीर्तिष्यमाणाः। तत्र ध्यानं तावत् इह उचितम् उपदेक्ष्यामः, यत् एतत् स्वप्रकाशं सर्वतत्त्वान्तर्भूतं परं तत्त्वम् उक्तं, तदेव निजहृदयबोधे ध्यात्वा, तत्र प्रमातृप्रमाणप्रमेय- रूपस्य वह्न्यर्कसोमत्रितयस्य संघट्टं ध्यायेत् यावत् असौ महाभैरवाग्निः ध्यानवातसमिद्धाकारः संपद्यते, तस्य प्राक्तनशक्तिज्वालाद्वादशकपरि- वृतस्य चक्रात्मनः बाह्ये ग्राह्यात्मनि विश्रान्तं चिन्तयेत्, तेन च विश्रान्तेन प्रथमं तद्ग्राह्यं सोमरूपतया सृष्टिक्रमेण प्रपूरितं, ततः अर्करूपतया स्थित्या अवभासितं, ततोऽपि संहारवह्निरूपतया विलापितं, ततः अनुत्तरात्मताम् आपादितं ध्यायेत्। एवं तच्चक्रं समस्तबाह्यवस्तुप्रभेदपरिपूर्णं संपद्यते। ततो वासनाशेषानपि भावान् तेन चक्रेण इत्थं कृतान् ध्यायेत्। एवम् अस्य अनवरतं ध्यायिनः स्वसंविन्मात्रपरमार्थान् सृष्टिस्थितिसंहारप्रबन्धान् सृष्ट्यादिस्वातन्त्र्यपरमार्थत्वं च स्वसंविदो निश्चिन्वन्तः सद्य एव भैरवो- भावः। अभ्यासात् तु सर्वैप्सितसिद्ध्यादयोऽपि। स्वप्रकाशं समस्तात्मतत्त्वं मात्रादिकं त्रयम्। अन्तःकृत्य स्थितं ध्यायेद्धृदयानन्दधामनि॥ तद्द्वादशमहाशक्तिरश्मिचक्रेश्वरं विभुम्। व्योमभिर्निःसरद्बाह्ये ध्यायेत्सृष्ट्यादिभावकम्॥
३८ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ५ तद्ग्रस्तसर्वबाह्यान्तर्भावमण्डलमात्मनि । विश्राम्यन्भावयेद्योगी स्यादेवं स्वात्मनः प्रथा ॥ इति संग्रहश्लोकाः । इति ध्यानम् ।
अथ उच्चारः
तत्र प्राणम् उच्चिचारयिषुः पूर्वं हृदय एव शून्ये विश्राम्यति, ततो बाह्ये प्राणोदयात्, ततोऽपि बाह्यं प्रति अपानचन्द्रोपूरणेन सर्वात्मतां पश्यति, ततः अन्यनिराकाङ्क्षो भवति, ततः समानोदयात् संघट्टविश्रा- न्तिम् अनुभवति, ततः उदानवह्ल्युदये मातृमेयादिकल्पना ग्रसते । तद्ग्रासकवह्निप्रशमे व्यानोदये सर्वावच्छेदवन्ध्यः स्फुरति । एवं शून्यात् प्रभृति व्यानान्तं या एता विश्रान्तयः ता एव निजानन्दो, निरानन्दः, परानन्दो, महानन्दः चिदानन्द इति षट् आनन्दभूमय उपदिष्टाः, यासाम् एकः अनुसंधाता उदयास्तमयविहीनः अन्तर्विश्रान्तिपरमार्थ- रूपो जगदानन्दः तत् एतासु उच्चारभूमिषु प्रत्येकं द्व्यादिशः सर्वशो वा विश्राम्य अन्यत् तद्देहप्राणादिव्यतिरिक्तं विश्रान्तिस्पदम् आसादयति । तदेव सृष्टिसंहारथीजोच्चारणरहस्यम् अनुसंदधत् विकल्पं संकुर्यात्, आसु च विश्रान्तिषु प्रत्येकं पञ्च अवस्था भवन्ति प्रवेशतारतम्यात् । तत्र प्रागानन्दः पूर्णतांशस्पर्शात्, तत उद्भवः क्षणं निःशरीरतायां रूढेः, ततः कम्पः स्वबलाक्रान्तौ देहतादात्म्यशैथिल्यात्, ततो निद्रा बहिर्मुखत्वविल- यात् । इत्थम् अनात्मनि आत्मभावे लीने स्वात्मनः सर्वमयत्वात् आत्मनि अनात्मभावो विलयते इति, अतो घूर्णिः महाव्याप्त्युदयात् । ता एता जाग्रदादिभूमयः तुर्यातीतान्ताः । एताश्च भूमयः त्रिकोणकन्दहृत्तालू- र्ध्वकुण्डलिनीचक्रप्रवेशे भवन्ति । एवम् उच्चारविश्रान्तौ यत् परं स्पन्दनं गलिताशेषवेद्यं, यच्च उन्मिषद्देशं, यच्च उन्मिषितवेद्यं, तदेव लिङ्गत्रयम् इति वक्ष्यामः स्वावसरे । परं चात्र लिङ्गं योगिनीहृदयम् । तत्र मुख्या स्पन्दनरूपता संकोचविकासात्मतया यामलहृपतोद्ध्येन विसर्गकलाविक्रान्तिलाभात् इत्यलम् । अप्रकाशः अत्र अनुप्रवेशः ।
पूर्वं स्वबोधे तदनु प्रमेये विश्रम्य मेयं परिपूरयेत । पूर्णेऽत्र विश्राम्यति मातृमेयविभागमाश्वेव स संहरेत ॥
आ. ५ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ३९ व्याप्याथ विश्राम्यति ता इमाः स्युः शून्येन साकं षडुपायभूम्यः । प्राणादयो व्याननपश्चिमास्त- ल्लीनश्च जाग्रत्प्रभृति प्रपञ्चः ॥ अभ्यासनिष्ठोऽत्र तु सृष्टिसंहृद्विमर्शधामन्यचिरेण रोहेत् । इति आन्तरश्लोकाः । इति उच्चारणम् । अथ सूक्ष्मप्राणात्मा वर्णः अस्मिन् एव उच्चारे स्फुरन् अव्यक्तानुकृतिप्रायो ध्वनिः वर्णः, तस्य सृष्टिसंहारबीजे मुख्यं रूपं, तदभ्यासात् परसंवित्तिलाभः, तथाहि— कादौ मान्ते साच्के अनच्के वा अन्तरुच्चारिते स्मृते वा समविशिष्टः संवित्स्पन्दस्पर्शः समयानपेक्षित्वात् परिपूर्णः, समयापेक्षिणोऽपि शब्दाः तदर्थभावका मनोरज्यादिवत्, अनुत्तरसंवित्स्पर्शात् एकीकृतहृत्कण्ठोष्ठो द्वादशान्तद्वयहृदयं च एकीकुर्यात् इति वर्णरहस्यम् । अन्तःस्फुरद्विमर्शा- नन्तरसमुद् भूतं सितपीताद्यान्तरं वर्णम् उद्भाव्यमानं संविदम् अनुभाव- यति इति केचित् । वाच्यविरहेण संवित्स्पन्दादिन्दूर्कगतिनिरोधाभ्याम् । यस्य तु समसंप्रवेशात् पूर्णा चिद्बीजपिण्डवर्णविधौ ॥ इति आन्तरश्लोकः । इति वर्णविधिः करणं तु मुद्राप्रकाशने वक्ष्यामः । विकल्पः कस्यापि स्वयमनुपपन्नपूर्णमयता- मुपायात्संस्कारं व्रजति स उपायोऽत्र बहुधा । धियि प्राणे देहे तदनु बहिरित्याणवतया स निर्णीतो नैषां परफलविधौ कापि हि भिदा ॥ सुण्णउ रविससि दहन सउ उस्सउ एहु सवीरु । उहि अच्छन्तउ परमपउ पावइ अच्चिरे वीरु ॥ इति श्रीमदभिनवगुप्ताचार्यविरचिते तन्त्रसारे आणव- प्रकाशनं नाम पञ्चममाह्निकम् ।
आणव उपाय उस विषय में जब विकल्प बिना किसी उपाय के अपने में अपना संस्कार कर सकता है, तब वह जीव पशुजनों¹ के द्वारा किये जानेवाले कार्यों से मुक्त होकर शुद्ध विद्या के अनुग्रह से शक्तिरूप धारण करता है, जिसके फलस्वरूप वह शाक्तज्ञान को उपाय रूप में अपनाता है । इस विषय में पिछले आह्निक में विचार किया गया है । जब उसे अन्य कोई विकल्प उपायरूप में अपने संस्कार के लिए अपेक्षित है, तब वह बुद्धि, प्राण, शरीर, घट आदि परिच्छिन्न-स्वभाव किसी वस्तु को उपायरूप में ग्रहण करता है और अणुभाव-प्राप्त जीव में आणव ज्ञान ( संकुचित ज्ञान ) उदित कराता है। उनमें बुद्धि ध्यानात्मक है,² १. पाशबद्ध जीव ही पशु शब्द का अर्थ है । आत्मा में संकोच के आविर्भाव हो जाने से उसकी स्वाभाविक ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति भी संकुचित या परिच्छिन्न हो जाती हैं, उसके स्वभावभूत शिवत्व या पूर्णचैतन्य मानों ढक जाता है। उस समय उसे पशु या अणु कहा जाता है। आधारगत योग्यता के अनुसार अणु भी नानाप्रकार हैं। शक्तिपात को मात्रा के तारतम्य के अनुसार किसी-किसी आत्मा में स्वभाव से ही सत् तर्क का उदय नहीं होता। सत् तर्क के उदय के लिए उसे आगमों की अपेक्षा है, फिर उस आगम का निरूपण श्रीगुरु ही कर सकते हैं। आगमों के सम्यक् मनन से विशुद्ध विकल्पों का उदय होता है । लेकिन जिन साधकों में योग्यता बहुत कम है उनके मलिन विकल्पों के शोधन के लिए शुद्ध विकल्प ही पर्याप्त नहीं, उन्हें अन्य साधनों की अपेक्षा है। ये सब साधन संक्षेप में ध्यान, प्राण का आश्रयण और देह, इन्द्रिय आदि का व्यापार हैं। हमारे शरीर परमार्थ की प्राप्ति में अत्यन्त स्थूल साधन है--देह में जिनका आत्मभिमान प्रबल है उनके लिए शरीर को भी बाह्य साधन माना जाता है । शरीर के द्वारा क्रियात्मक मुद्रा आदि सम्पन्न होता है । २. ध्यान बुद्धि का कार्य है। बुद्धि के स्तर में जिसका आत्मबोध प्रबल है उसके लिए ध्यान ही उत्तम साधन है। उसी प्रकार प्राणमय भूमि में आत्मभिमान रखने वालों के लिए उच्चारण ही प्रधान उपाय है । शरीर
आ. ५ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ४१ प्राण स्थूल और सूक्ष्मरूप है, जिनमें पहला ( स्थूल प्राण ) उच्चारण- स्वभाव है। उच्चारण का अर्थ प्राण आदि पाँच प्रकार वृत्तियाँ हैं। सूक्ष्म प्राण वर्णात्मक है—जिसके बारे में आगे बतलायेंगे। शरीर जो विशेष प्रकार के अवयव सन्निवेश रूपहै उसे करण कहा जाता है। घट आदि जो घड़ा, स्थण्डिल लिङ्ग आदि के पूजन में उपयोगी उपायों के रूप में वर्णित किये जायेंगे, वे बाहरी साधन हैं। उनमें जो ध्यान है यहाँ उचित समझकर उसके स्वरूप के सम्बन्ध में उपदेश करेंगे। यह् जो स्वप्रकाश सब तत्त्वों के अन्तरङ्ग¹ जिसे परमतत्त्व कहा गया है उसे अपने हृदयरूपी बोध में ध्यान करने के बाद उसी स्थान में प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय रूप अग्नि, सूर्य, सोम में आत्मभिमान रहने पर करण, मुद्रा, आसन आदि विकल्पों को हटाने के लिए उपयोगी साधन समझे जाते हैं। प्राण दो प्रकार है—एक सामान्य रूप और दूसरा विशेष। यही विशेष प्राण, प्राण अपान, समान, उदान और व्यान रूप वृत्तियाँ हैं। यह विशेष प्राण सामान्य प्राण में आश्रित होकर पाँच वृत्तियों के रूप में शरीर के भिन्न-भिन्न कार्यों का सम्पादन करता है, इसका स्वभाव उच्चारण है। सामान्य प्राण स्पन्द, स्फुरत्ता आदि नामों से परिचित है। संवित् ही सृष्टि के प्रथम उन्मेष के समय शून्यता को प्रकट करने के बाद प्राण रूप धारण करता है। १. चैतन्य-स्वभाव परासंवित् स्वप्रकाश है। वही अपनी स्वातन्त्र्य से सर्वतत्त्व- मय है, अर्थात् भिन्न-भिन्न रूपों में वही प्रकाशमान हैं। उन्हें अपने हृदय में ध्यान करना चाहिए। हृदय ही सब तत्त्वों का अन्तरतम है। योगो को अवधानता के साथ प्राण, अपान और उदानरूपी सोम, सूर्य और अग्नि के सामरस्य का ध्यान करना चाहिए। इस प्रकार ध्यान कुम्भक वृत्ति के द्वारा इस प्रकार अनुसन्धान करना चाहिए कि प्राण अपान और उदान सब अपनी विशिष्ट वृत्तियों को छोड़ कर अभिन्न हो गये हैं। अरणि के मन्थन से जैसे अग्नि प्रज्ज्वलित हो उठती है उसी प्रकार प्राण और अपान की विरोधी गति मध्यधाम के प्रवेश के साथ-साथ महाभैरव रूपी उदान वह्नि का रूप धारण कर प्रज्ज्वलित हो उठी है। उस अग्निज्वाला में परिच्छिन्न प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय भी परिच्छिन्नता को छोड़कर परप्रमाता के साथ तादात्म्य प्राप्त कर लिया है—इस प्रकार ध्यान होना चाहिए।
४२ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ५ इन तीनों के सामरस्य का ध्यान करना चाहिए। यह ध्यान तब तक चलता रहे जब तक महाभैरव रूप अग्नि ध्यान के पवन से ज्वाला रूप धारण कर ले। वह अग्नि पहले आलोचित ( तृतीय आह्निक में ) द्वादश शक्तिरूप¹ शिखाओं से घिरी हुई है और चक्ररूपी है और आँखें आदि किसी एक छिद्र रूपी दरवाजे से बाहर निकल कर ग्राह्य वस्तु में विश्राम लेती हैं—ऐसा चिन्तन करना चाहिए। बाहर विश्रान्त उस तत्त्व द्वारा वह बाहरी दृश्य पहले सोमरूप सृष्टि क्रम से आपूरित, उसके बाद सूर्यरूप स्थिति से अवभासित उसके अनन्तर संहाररूप अग्नि के द्वारा विलयन और अन्त में उसे अनुत्तर² स्वभाव में स्थापित करता है—ऐसा ध्यान करना चाहिए। इस प्रकार वह चक्र सब बाहरी वस्तुओं के साथ अभिन्न होकर परिपूर्ण होता है। इसके बाद वासनारूप³ में स्थित सभी भावों को उस चक्र के साथ ( इस प्रकार अनुत्तरतारूप प्रदान करते हुए ) ध्यान करना चाहिए। इस प्रकार निरन्तर ध्यान करनेवाले को सृष्टि, १. चतुर्थ आह्निक में चक्रेश्वररूपी परप्रमाता का जो उल्लेख हुआ वह द्वादश शक्तियों से परिवेष्टित है ऐसा कहा गया है। वे शक्तियाँ सृष्टि, स्थिति, संहार से सम्बन्धित हैं, प्रत्येक स्थिति के साथ जो अनवच्छिन्न चतुर्थ है और जिसे अनाख्या कहते हैं उसका सम्बन्ध वर्तमान है, इसलिए शक्तियों की संख्या बारह हैं। वे इस प्रकार हैं— (क) सृष्टि-सृष्टि, सृष्टि स्थिति, सृष्टि संहार, सृष्टि अनाख्या। (ख) स्थिति सृष्टि, स्थिति-स्थिति, स्थिति संहार, स्थिति अनाख्या। (ग) संहार सृष्टि, संहार स्थिति, संहार-संहार, संहार अनाख्या। २. अनुत्तर चक्र ( द्वादशारत्मक ) चक्षु आदि द्वार से बाहर जाता है और विषय का रूप धारण कर लेता है। जो विषय का रूप है वह सोमात्मक प्रमेय है, इन्द्रिय उस समय प्रमाण है और वह सूर्यात्मक है और विषय का ग्राहक हो प्रमाता है जो अग्नि आत्मक है। प्रमाता के द्वारा विषयों का अवभासना ही सृष्टि है। विषय की भासना के बाद कुछ क्षण तक वह विषय को अनुराग से देखता है, यही स्थिति है। इसके बाद 'मैंने इसे जान लिया हूँ' इस प्रकार उसे अपने में उपसंहृत कर लेता है—यही संहार है। अन्त में सभी चिदग्नि में स्थापित करता है—यही अनुत्तर है। ३. भावों के नाश के अनन्तर वासना रूप में अर्थात् संस्कार के रूप में उनकी स्थिति रहती है, इसलिए उनका भी अग्निज्वाला में लीन करना चाहिए।
आ. ५ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ४३ स्थिति और संहार रूप कार्य समूह अपने संवित् ही जिसका परमतत्त्व है और परम स्वरूप सृष्टि आदि कार्य करनेवाली स्वातन्त्र्य शक्तिरूप स्वसंवित् ही है—इस प्रकार दृढ़ निश्चय होने पर उसे तत्काल ही भैरव- भाव आ जाता है। इसके अभ्यास से सभी ईप्सित सिद्धियाँ भी होती हैं। माता, मान और मेय रूपी तीन स्थितियों को अपने स्वरूप में रख कर स्थित है, उस स्वप्रकाश, और जो सभी के आत्मस्वरूप हैं उन्हें अपने हृदयरूप आनन्दधाम में ध्यान करना चाहिए। उन द्वादश महाशक्तिरूप रश्मियों के चक्रेश्वर को जो व्यापक हैं जो इन्द्रियरूपी शून्य मार्ग से बाहर निःसरणशील हैं और सृष्टि आदि भावों का जनक हैं ऐसा ध्यान करना चाहिए। उनके द्वारा सब बाह्य भावसमूह आत्मरूपी अखण्ड मण्डल में अन्तर्भाव और उसी में उनका (भावों का) विश्राम हो रहा है—योगी को इस प्रकार भावना करनी चाहिए। ऐसे होने पर आत्मस्वरूप का प्रकाश होगा। संग्रह श्लोक इस प्रकार हैं। इति ध्यानं। उच्चार¹ प्राण को उच्चारण करने के इच्छुक (ऊर्ध्व मुख प्रेरित करने के इच्छुक) मनुष्य पहले हृदयरूप शून्य² में उसे विश्राम कराता है, इसके १. प्राण के प्राणन क्रिया के सहारे कैसे अनुत्तर स्वभाव खुल जाता है उच्चार के रहस्य बतलाते हुए ग्रन्थकार उसे स्पष्ट करते हैं। प्राणात्मक उच्चार से एक अव्यक्त ध्वनि निरन्तर स्फुरित होती है, इसे अनाहत नाद कहते हैं। प्राण के उदय होने के पहले हृदय में उसकी स्थिति क्षणभर के लिए होती है। २. शून्य शब्द से अभाव को समझना चाहिए। यह अभाव सब भावों की विलयन रूप स्थिति है। हृदय भी आकाश रूप है जहाँ किसी प्रकार भाव का अस्तित्व नहीं है, संवित् ही उसका एकमात्र स्वरूप है। यहीं चैतन्य का स्वात्मभूत आनन्द विकसित रूप में है, इसलिए इस आनन्द का नाम पड़ा है निजानन्द, यह आनन्द प्रमाता के स्वरूप के अनुभव में ही स्थित है—स्वरूप के साक्षात्कार से इस आनन्द का प्रकाशन होता है।
४४ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ५ बाद बाहर प्राण का उदय होता है। वहाँ भी उस बाह्य का अपानरूपी चन्द्र के द्वारा आपूरण होने पर उसकी सर्वात्मतारूप को देखता है, उसके बाद वह दूसरे के प्रति आकांक्षा रहित होता है, उसके अनन्तर समान के उदय होने पर सब विषयों के परस्पर मेलनरूप विश्रान्ति का अनुभव करता है, उसके बाद उदानरूप अग्नि के उदय होने पर प्रमाता, प्रमेय रूप कलना का ग्रास होता है। उसके ग्रास करनेवाली अग्नि के प्रशमन हो जाने पर व्यान का उदय होता है, तब सब प्रकार की अवच्छिन्नता (संकोच) हट जाती है। इस प्रकार शून्य से व्यान तक ये जो विश्रान्तियाँ हैं उन्हें निजानन्द¹, निरानन्द², परानन्द³, ब्रह्मानन्द³, महानन्द⁴, चिदानन्दरूप⁵ छः आनन्दभूमियों के रूप में उपदेश किये गये हैं जिनका १. चैतन्यशक्ति शून्यता के अवभासना के बाद प्राणरूप धारण करती है। प्राण जड़ और चेतन दोनों धर्मों से युक्त है, क्योंकि परमेश्वर ने अन्य जड़ों से भिन्न बनाकर इसमें अपनी अहन्ता रूप कर्तृत्व प्रदान किया है और इसे ग्राहक बनाया है। यही प्राण प्रमातृ भूमि में निजानन्द रूप है, लेकिन जब प्रमाता प्रमाण भूमि को स्पर्श करता हुआ प्रमेय की ओर आगे बढ़ता है अर्थात् प्राण जब स्वल्प मात्रा में बहिर्मुख होता है तब उस आनन्द का नाम पड़ता है निरानन्द क्योंकि उस समय वह प्रमातृगत आनन्द से रहित हो जाता है। २. परानन्द—प्रमेय वस्तु के उदय होने पर इस प्रकार आनन्द की भावना होनी चाहिए। अपान के उदय से प्रमेय का उदय माना जाता है। प्रमेय के उदय के कारण भिन्नता आ जाती है इसलिए यह आनन्द निजी नहीं आत्मा से किञ्चित् भिन्न का है—इसलिए इसे परानन्द कहते हैं। ३. समान भूमि में समग्र प्रमेय घुलमिलकर एक बन जाता है। उस समय उनके परस्पर के सम्मिलन से जिस आनन्द का विकास होता है उसमें बृहत्त्व और बृंहितत्व दोनों गुणों के समावेश के कारण उसे ब्रह्मानन्द कहा जाता है। ४. प्राण और अपानों के प्रतिदिन की जो कलनाएँ हैं, जिसकी संख्या २१६०० हैं, योगी मध्यमार्ग में उन्हें विलयन कर सकने पर वही प्राण उदान रूप धारण करता है। उदान वह्निरूप है, उस समय प्रमातृगत आनन्द का अनुभव होता है—उसे स्वात्म-विमर्शमय रूप में चिन्तन करना चाहिए। इसका नाम महानन्द है। ५. उपर्युक्त महानन्द के विश्राम के अनन्तर महाव्याप्ति का उदय होता है।
आ. ५ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ४५ एक अनुसन्धाता है। उसका न तो उदय है न अस्त, अन्तर्विश्रान्ति ही जिसका परमरूप है, वह जगदानन्द है। इन उच्चारभूमियों में प्रत्येक को दो-दो बार अथवा सम्पूर्ण रूप से विश्रान्त करा कर शरीर और प्राणों से भिन्न विश्रान्ति का स्वरूप का अनुभव (योगी) प्राप्त करता है। विश्रान्ति तत्त्व ही सृष्टि और संहार बीज¹ के उच्चारण का रहस्य है—इसके अनुसन्धान करते हुए उसे विकल्पों का संहार करना चाहिए। इन विश्रान्तियों के प्रत्येक में पाँच-पाँच स्थितियाँ हैं जो प्रवेश के तार- तम्य के कारण उदित होती हैं। उसमें प्रागानन्द² (चमत्कार विशेष है) क्योंकि उस समय पूर्णता का स्पर्श हो जाता है। इसके बाद उद्भव है— उस समय सब प्रकार उपाधिरहित व्यान के उदय के साथ-साथ सब जड़ों से सम्पर्कहीन चिदानन्द का अनुभव होने लगता है। १. सृष्टि बीज 'स' कार है और संहार बीज 'ह' कार है। २. प्रागानन्द, उद्भव, कम्प, निद्रा, घूर्णि ये पाँच पारिभाषिक शब्द हैं। जिनकी व्याख्या निम्न प्रकार है। शरीर आदि को साधन बनाकर परम तत्त्व में प्रवेश पाने के इच्छुक योगी, पूर्णता के प्रति उन्मुख होते ही एक प्रकार आनन्द का अनुभव करते हैं। उनमें वास्तविक उन्मुखता की स्थिति आ जाने पर पहले आनन्द रूप चमत्कार-विशेष निज अनुभव में आता है। यह पहली स्थिति है। उसके बाद बिजली के क्षणिक प्रकाश से जैसे सभी वस्तुएँ एक-सी हो जाती हैं—सभी प्रकाशमय हो जाते हैं; उसी प्रकार योगी के शरीर में जो आत्मबोध पहले विद्यमान था वह उस क्षणिक प्रकाश से कट जाता है। इसे ग्रन्थिभङ्ग के रूप में वर्णित किया जा सकता है। ग्रन्थिभङ्ग के साथ-साथ नीचे की भूमि के साथ जो सम्बन्ध पहले था वह कट जाता है और योगी परधाम की ओर बढ़ता है—यह ऊर्ध्वगमन रूप है। इसे उद्भव कहते हैं। यह क्षणभर के लिए उत्पन्न होता है, बराबर के लिए होने पर परिपूर्णता आ जाती है, लेकिन इससे योगी का विशेष लाभ अवश्य होता है। इस क्षणिक स्पर्श से संवित् के जो अहन्तारूप बल है और जो आत्मा में आत्माभिमान रूप है उसका उदय होता है। इसके फलस्वरूप अनात्मा में आत्माभिमान गलने लगता है, पारिभाषिक शब्द से इसे कम्प कहते हैं। निद्रा के समय वाह्य वृत्ति का उपरम होता है और आन्तर विषय भी उस समय अस्फुट रहता है, उसी प्रकार योगी को भी संवित् के साथ
४६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ५ उस समय क्षणभर के लिए अपने अन्दर शरीर सम्बन्धी दृढ़ भावना कट जाती हैं, उसके बाद कम्प है जिसके उदय से अर्थात् उसके बल के द्वारा शरीर विषयक तादात्म्यबोध शिथिल हो जाता है । इसके बाद निद्रा है, क्योंकि उस समय बहिर्मुखता का विलयन हो जाता है । इस प्रकार अनात्म-विषयों में आत्मभाव कट जाने पर आत्मा की सर्वमयता के कारण आत्मा में अनात्मभाव विलीन होता है। इसलिए इसके बाद घूर्णि है, क्योंकि उस समय महाव्याप्ति का उदय हुआ है। ये सब जाग्रत आदि भूमियां १ हैं, तुर्यातीत जिनका अन्त है। ये भूमियाँ त्रिकोण, कन्द, हृदय, तालु और ऊर्ध्वकुण्डली आदि चक्रों के प्रवेश के समय अनुभव में आते हैं। इस प्रकार उच्चारण के विश्रान्तियों में निखिल वेद्य जहाँ विलीन हो गया है, जहाँ वेद्य उन्मेषभाव को प्राप्त कर रहा है, जहाँ वेद्य उन्मिषित है--ये तीन स्थितियाँ तीन प्रकार के लिङ्गरूप २ हैं जिसके बारे में अनुकूल समय पर आगे बतलायेंगे। परलिङ्ग योगिनी हृदय रूप है। इनमें जो मुख्य है वह स्पन्द स्वरूप है, जब संकोच और विकासात्मक स्वरूप की प्राप्ति होती है तब यामलरूप का उदय होता है और अन्त में तादात्म्य के अनुभव होने के पहले इस प्रकार की निद्रा स्थिति के सम्मुख होना पड़ता है। यह स्थिति सामयिक है। इसके अनन्तर परासंवित् ही सब वस्तुओं का परम स्वरूप है, उससे अतिरिक्त कुछ भी नहीं है—इस प्रकार स्थिति के उदय के साथ-साथ ऊर्ध्व गति का अवसान हो जाता है और योगी परासंवित् के साथ तदात्मता प्राप्त करता है। इसे घूर्णि कहते हैं, यह महाव्याप्ति रूपी है। १. किन-किन भूमियों में प्रागानन्द आदि विभिन्न प्रकार के अनुभव होते हैं उनका निर्देश ग्रन्थकार ने दिया है—(१) त्रिकोण है जिसे मूलाधार कहते हैं, (२) कन्द है जो उद्भव स्थान है, (३) कम्प का स्थान हृदय है, (४) तालु स्थान निद्रा का, ५. घूर्णि ऊर्ध्वकुण्डली या द्वादशान्त है। २. लिङ्ग तीन हैं—(१) व्यक्त, (२) व्यक्ताव्यक्त, (३) अव्यक्त। सब प्रकार की गतियों के विराम होने पर जो स्पन्ददशा का उदय होता है वही अव्यक्त लिङ्ग का स्वरूप है। इसी दशा से विश्व का उदय और विलयन होते हैं, इसलिए इसे लिङ्ग कहते हैं। व्यक्ताव्यक्त लिङ्ग 'इदमहं' प्रतीति रूप है। व्यक्तलिङ्ग विशेष स्पन्दरूप है।
आ. ५ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ४७ विसर्ग कला रूप विश्राम की प्राप्ति होती है। अब अधिक कहने से विरत रहता हूँ। इसमें अनुप्रवेश का मार्ग अप्रकाशनीय है। ✕ ✕ ✕ जो पूर्ण हैं वह अपने बोध में स्थित है, इसके अनन्तर प्रमेय में विश्राम लेकर मेय का आपूरण कर देते हैं, अन्त में मातृ मेय आदि विभागों को वह शीघ्र ही पूर्णस्वभाव में संहार करता है। ✕ ✕ + व्याप्ति के द्वारा जो विश्रान्ति आती है वे सब शून्य के साथ छः उपाय रूप भूमियाँ हैं। प्राण से लेकर व्यान जिसका अन्त है उनमें जाग्रत् आदि प्रपञ्च अन्तर्गत हैं। ✕ ✕ ✕ इस विषय में अभ्यासशील व्यक्ति सृष्टि संहार रूप विमर्शधाम में बिना बिलम्ब से आरूढ़ हो सकता है। ✕ ✕ ✕ इस विषय में अन्तर्गत श्लोक इतने हैं। उच्चारण की इति यहाँ है। अब सूक्ष्म प्राणात्मक वर्ण का विवरण है। इस उच्चारण में अव्यक्त की अनुकरण करने वाली ध्वनि जो निरन्तर स्फुरित होती है¹ वर्ण कहते हैं। सृष्टि और संहार बीज ही उसका १. प्राण की गति दो प्रकार हैं—एक स्पन्दरूप है और स्वाभाविक है और दूसरा क्रियात्मक तथा प्रयत्नजन्य है। प्राणात्मक उच्चार से एक अव्यक्त ध्वनि सदा ही स्फुरित होती रहती है जिसे अनाहत नाद कहते हैं। प्राणिमात्र के हृदय में यह स्वभाव से सर्वदा चलता रहता है—इसके उच्चारण करने वाला कोई नहीं है, न तो इसके रोकने वाला कोई है। अविभक्त रूप में सब वर्ण इसमें रहते हैं। यह सब वर्णों के कारण भी हैं, इसलिए अनाहत नाद भी वर्णपद वाच्य है। नाद के दो विभाग दृष्टिगोचर होते हैं—एक जो सदा प्रकाशमान है और जिसका तिरोभाव कभी नहीं होता ! इसका उदय ही होता है, अस्त नहीं होता। इसका जो दूसरा रूप है जो अपेक्षाकृत कम सूक्ष्म है, उसका उदय तथा अस्त दोनों ही हैं। नाद का जो सूक्ष्म रूप है जिसे सब वर्णों के अविभक्त रूप में वर्णित किया गया है वह अव्यक्त है। सृष्टि और
४८ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ५ स्वरूप है। उसके अभ्यास से परासम्वित् की प्राप्ति होती है। जैसे 'क' से 'स' तक वर्णों को स्वर के साथ या बिना स्वर से प्राण के साथ हृदय से उच्चारण करने पर या स्मरण करने पर संवित्-स्पर्श का अनुभव होता है। समय¹ की अपेक्षा न होने के कारण यह परिपूर्ण है, समय की अपेक्षा रखने वाले शब्द भी (अर्थात् लौकिक शब्द ) तत्तत् विषयों की भावना करने वालों को मन के द्वारा कल्पित राज्य के समान ( विषय को ) प्राप्त कराता है।² अनुत्तर-संवित् के स्पर्श से हृत् ( अ ), कण्ठ ओष्ठ ( औ ), दो द्वादशान्त और हृदय को एक बनाना चाहिए—वर्णों का यही रहस्य है। किसी-किसी का कथन है कि हृदय में स्फुरित विमर्श से उद्भूत श्वेत पीत आदि आन्तर वर्ण की भावना ही संवित् को अनुभव में लाते हैं। × × × संवित् रूप स्पन्द से जिसमें वाच्य के अभाव होने के कारण सोम और सूर्य की गतियों के निरोध के द्वारा चिद्बीज और पिण्ड वर्ण विधि में समान रूप में प्रवेश होने पर पूर्णता आ जाती है। यह आन्तर श्लोक है। वर्णविधि की समाप्ति यहाँ है। मुद्रा सम्बन्धी विचार के समय करण की चर्चा करेंगे। संहार बीज ही उसका मुख्य रूप है, अर्थात् इन दो बीजों का रूप धारण कर नाद अभिव्यक्त होता है। इसलिए इन दोनों बीजों के सहारे नाद का परामर्श होना चाहिए । १. जैसे जब कोई वृद्ध पुरुष किसी बालक को घट से परिचित कराते समय 'पृथुबुध्न उदर' युक्त किसी आकार को दिखलाकर 'यह इसका अभिधेय है' इस प्रकार जो कल्पित वाच्यवाचक रूप सम्बन्ध डालता है उसे ही समय कहते हैं । इस समय को ही संकेत कहते हैं । २. घट आदि शब्द के उच्चारण करते हुए पुरुष भी अपनी संवित् में घट आदि का साक्षात्कार करता है, जैसे कोई पुरुष काम या शोक से पीड़ित होकर कान्ता सम्बन्धी गम्भीर भावना के कारण कान्ता रूप को सामने प्रत्यक्ष देखता है। सान्त वर्ण समूह संवित् के साथ अभिन्न हैं, इसलिए सृष्टि आदि बीजों से अभिव्यक्त होने वाले नाद का पुनः-पुनः उच्चारण तथा स्मरण करने पर योगी चित् स्वरूप के साथ एकात्मता का अनुभव करता है ।
आ. ५ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ४९ किसी-किसी का विकल्प बिना कोई उपाय से पूर्णता को प्राप्त करता है, और किसी का उपाय से संस्कार प्राप्त कर लेता है। वे उपाय भी नाना प्रकार है। बुद्धि प्राण तथा शरीर में उसके बाद बाहर संकुचित रूप में इसका निर्णय किया गया है, लेकिन परमफल की प्राप्ति के विषय में इनकी कोई भिन्नता नहीं है। इति तन्त्रसार पञ्चम आह्निक। ४
अथ षष्ठमाह्निकम् अथ बाह्यविधिः स एव स्थानप्रकल्पनशब्देन उक्तः, तत्र त्रिधा स्थानं—प्राणवायुः शरीरं बाह्यं च, तत्र प्राणे तावत् विधिः, सर्वः असौ वक्ष्यमाणः अध्वा प्राणस्थः कल्प्यते, तस्य क्रमाक्रमकलनैव कालः, स च परमेश्वर एव अन्तर्भाति, तद्भासनं च देवस्य काली नाम शक्तिः, भेदेन तु तदाभासनं क्रमाक्रमयोः प्राणवृत्तिः । संविदेव हि प्रमेयेभ्यो विभक्तं रूपं गृह्णाति, अत एव च अवच्छेदयोगात् देह्यतां यान्ती नभः, ततः स्वातन्त्र्यात् मेये स्वीकारौत्सुक्येन निपतन्ती क्रियाशक्तिप्रधाना प्राणनारूपा जीवस्वभावा पञ्चभी रूपैः देहं यतः पूरयति, ततोऽसौ चेतन इव भाति । तत्र क्रिया- शक्तौ कालाध्वा, तत्र वर्ण-मन्त्र-पदाध्वनः कालाध्वनि स्थितिः पर-सूक्ष्म- स्थूलरूपत्वात् । देशाध्वस्थितिस्तु तत्त्व-पुर-कलात्मना इति भविष्यति स्वावसरे । तत्र यद्यपि देहे सबाह्याभ्यन्तरम् ओतप्रोतरूपः प्राणः, तथापि प्रस्फुटसंवेद्यप्रयत्नः असौ हृदयात्प्रभृति इति, तत एव अयं निरूपणीयः । तत्र प्रभुशक्तिः आत्मशक्तिः यत्न इति त्रितयं प्राणेरणे हेतुः—गुणमुख्यभावात् । तत्र हृदयात् द्वादशान्तान्तं स्वाङ्गुलैः सर्वस्य षट्त्रिंशदङ्गुलः प्राणचारः निर्गमे प्रवेशे च, स्वोचितबलप्रयत्नहेतुत्वात् सर्वस्य । तत्र घटिका तिथिः मासो वर्षं च वर्षसमूहात्मा, इति समस्तः कालः परिसमाप्यते । तत्र सपञ्चांशे अङ्गुले चषक इति स्थित्या घटिकोदयः घटिका हि षष्ट्या चषकैः तस्मात् द्वासप्तत्यङ्गुला भवति । अथ तिथ्युदयः । सपादमङ्गुलद्वयं त्रुटिः उच्यते, तासु चतसृषु प्रहरः, त्रुटयर्धं त्रुटयर्धं तत्र संध्या, एवं निर्गमे दिनं, प्रवेशे रात्रिः, इति तिथ्युदयः । अथ मासोदयः । तत्र दिनं कृष्णपक्षः, रात्रिः शुक्लः, तत्र पूर्वं त्रुटयर्धं अन्त्यं च त्रुटयर्धं विश्रान्तिः अकालकलिताः, मध्यास्तु पञ्चदश त्रुटय एव तिथयः, तत्र प्रकाशो विश्रान्तिश्च इति एते एव दिननिशे । तत्र वेद्यकथताप्रकाशो दिनं, वेद्यस्य विचारयितरि लयो रात्रिः, ते च प्रकाशविश्रान्ती चिराचिरवैचित्र्यात् अनन्तभेदे, तत्साम्ये तु विषुवत् ।
आ. ६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ५१ तत्र कृष्णपक्षे प्राणार्के अपानचन्द्र आप्यायिकाम् एकामेकां कलाम् अर्पयति, यावत् पञ्चदश्यां त्रुटौ द्वादशान्तसमीपे क्षीणपृथग्भूतकलाप्रसरः चन्द्रमाः प्राणार्क एव लीयते। तदनन्तरं यत् त्रुट्यर्धं स पक्षसंधिः । तस्य च त्रुट्यर्धस्य प्राच्यम् अर्धम् आमावस्यं, द्वितीयं प्रातिपदं । तत्र प्रातिपदे तस्मिन् भागे स आमावस्यो भागो यदा कासप्रतन्नावधानादि- कृतात् तिथिच्छेदात् विशति तदा तत्र ग्रहणम्, तत्र च वेद्यरूपसोम- सहभूतो मायाप्रमातृराहुः स्वभावतया विलापनाशक्तः केवलम् आच्छादनमात्रसमर्थः सूर्यगतं चान्द्रं अमृतं पिबति इति । प्रमातृप्रमाण- प्रमेयत्रितयाविभागकारित्वात् स पुण्यः कालः पारलौकिकफलप्रदः । ततः प्रविशति प्राणे चिदर्क एकैकया कलया अपानचन्द्रम् आपूरयति, यावत् पञ्चदशी त्रुटिः पूर्णिमा, तदनन्तरं पक्षसंधिः ग्रहणं च इति प्राग्वत्, एतत् तु ऐहिकफलप्रदम्, इति मासोदयः । अथ वर्षोदयः । तत्र कृष्णपक्ष एव उत्तरायणं षट्सु अङ्गुलेषु संक्रान्तिः मकरात् मिथुनान्तं । तत्र प्रत्यङ्गुलं पंच तिथयः तत्रापि दिनरात्रिविभागः, एवं प्रवेशे दक्षिणायनं, गर्भत्वम्, उद्भवेच्छा, उद्बुभूषुता, उद्भविष्यत्वम्, उद्भवारम्भः, उद्भवत्ता, जन्मादिविकार- षट्कं च इति क्रमात् मकरादिषु इति । तथैव उपासा अत्र फलं समुचितं करोति। अत्र च दक्षाद्याः पितामहान्ता रुद्राः शक्तयश्च द्वादशाधिपतय, इति वर्षोदयः । प्रत्यङ्गुलं षष्टिः तिथय इति क्रमेण संक्रान्तौ वर्षम् इत्यनेन क्रमेण प्रवेशनिर्गमयोः द्वादशाब्दोदयः, प्रत्यङ्गुलं तिथीनां शतत्रयं, सपंञ्चां- शेऽङ्गुले वर्षं, यत्र प्राक् चषकम् उक्तम् इति गणनया संक्रान्तौ पञ्च वर्षाणि, इति अनया परिपाट्या एकस्मिन् प्राणनिगमप्रवेशकाले षष्ट्यब्दोदयः, अत्र एकविंशतिसहस्राणि षट् शतानि इति तिथीनां संख्या । तावती एव अहोरात्रे प्राणसंख्या, इति न षष्ट्यब्दोदयात् अधिकं परीक्ष्यते आनन्त्यात् । तत्र मानुषं वर्षं देवानां तिथिः, अनेन क्रमेण दिव्यानि द्वादशवर्षसहस्राणि चतुर्युगम् । चत्वारि त्रीणि द्वे एकम् इति कृतात् प्रभृति तावद्भिः शतैः अष्टौ संध्याः। चतुर्युगानाम् एकसप्तत्या मन्वन्तरम्, मन्वन्तरैः चतुर्दशभिः ब्राह्मं दिनं, ब्रह्मदिनान्ते कालग्निसंधे लोकत्रये अन्यत्र च लोकत्रये धूमप्रस्वापिते सर्वे जना वेगवदग्निप्रेरिता जनलोके प्रलयाकलीभूय तिष्ठन्ति । प्रबुद्धास्तु कूष्माण्डहाकेशाद्या