तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआ. ५ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ४३ स्थिति और संहार रूप कार्य समूह अपने संवित् ही जिसका परमतत्त्व है और परम स्वरूप सृष्टि आदि कार्य करनेवाली स्वातन्त्र्य शक्तिरूप स्वसंवित् ही है—इस प्रकार दृढ़ निश्चय होने पर उसे तत्काल ही भैरव- भाव आ जाता है। इसके अभ्यास से सभी ईप्सित सिद्धियाँ भी होती हैं। माता, मान और मेय रूपी तीन स्थितियों को अपने स्वरूप में रख कर स्थित है, उस स्वप्रकाश, और जो सभी के आत्मस्वरूप हैं उन्हें अपने हृदयरूप आनन्दधाम में ध्यान करना चाहिए। उन द्वादश महाशक्तिरूप रश्मियों के चक्रेश्वर को जो व्यापक हैं जो इन्द्रियरूपी शून्य मार्ग से बाहर निःसरणशील हैं और सृष्टि आदि भावों का जनक हैं ऐसा ध्यान करना चाहिए। उनके द्वारा सब बाह्य भावसमूह आत्मरूपी अखण्ड मण्डल में अन्तर्भाव और उसी में उनका (भावों का) विश्राम हो रहा है—योगी को इस प्रकार भावना करनी चाहिए। ऐसे होने पर आत्मस्वरूप का प्रकाश होगा। संग्रह श्लोक इस प्रकार हैं। इति ध्यानं। उच्चार¹ प्राण को उच्चारण करने के इच्छुक (ऊर्ध्व मुख प्रेरित करने के इच्छुक) मनुष्य पहले हृदयरूप शून्य² में उसे विश्राम कराता है, इसके १. प्राण के प्राणन क्रिया के सहारे कैसे अनुत्तर स्वभाव खुल जाता है उच्चार के रहस्य बतलाते हुए ग्रन्थकार उसे स्पष्ट करते हैं। प्राणात्मक उच्चार से एक अव्यक्त ध्वनि निरन्तर स्फुरित होती है, इसे अनाहत नाद कहते हैं। प्राण के उदय होने के पहले हृदय में उसकी स्थिति क्षणभर के लिए होती है। २. शून्य शब्द से अभाव को समझना चाहिए। यह अभाव सब भावों की विलयन रूप स्थिति है। हृदय भी आकाश रूप है जहाँ किसी प्रकार भाव का अस्तित्व नहीं है, संवित् ही उसका एकमात्र स्वरूप है। यहीं चैतन्य का स्वात्मभूत आनन्द विकसित रूप में है, इसलिए इस आनन्द का नाम पड़ा है निजानन्द, यह आनन्द प्रमाता के स्वरूप के अनुभव में ही स्थित है—स्वरूप के साक्षात्कार से इस आनन्द का प्रकाशन होता है।