तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ५ इन तीनों के सामरस्य का ध्यान करना चाहिए। यह ध्यान तब तक चलता रहे जब तक महाभैरव रूप अग्नि ध्यान के पवन से ज्वाला रूप धारण कर ले। वह अग्नि पहले आलोचित ( तृतीय आह्निक में ) द्वादश शक्तिरूप¹ शिखाओं से घिरी हुई है और चक्ररूपी है और आँखें आदि किसी एक छिद्र रूपी दरवाजे से बाहर निकल कर ग्राह्य वस्तु में विश्राम लेती हैं—ऐसा चिन्तन करना चाहिए। बाहर विश्रान्त उस तत्त्व द्वारा वह बाहरी दृश्य पहले सोमरूप सृष्टि क्रम से आपूरित, उसके बाद सूर्यरूप स्थिति से अवभासित उसके अनन्तर संहाररूप अग्नि के द्वारा विलयन और अन्त में उसे अनुत्तर² स्वभाव में स्थापित करता है—ऐसा ध्यान करना चाहिए। इस प्रकार वह चक्र सब बाहरी वस्तुओं के साथ अभिन्न होकर परिपूर्ण होता है। इसके बाद वासनारूप³ में स्थित सभी भावों को उस चक्र के साथ ( इस प्रकार अनुत्तरतारूप प्रदान करते हुए ) ध्यान करना चाहिए। इस प्रकार निरन्तर ध्यान करनेवाले को सृष्टि, १. चतुर्थ आह्निक में चक्रेश्वररूपी परप्रमाता का जो उल्लेख हुआ वह द्वादश शक्तियों से परिवेष्टित है ऐसा कहा गया है। वे शक्तियाँ सृष्टि, स्थिति, संहार से सम्बन्धित हैं, प्रत्येक स्थिति के साथ जो अनवच्छिन्न चतुर्थ है और जिसे अनाख्या कहते हैं उसका सम्बन्ध वर्तमान है, इसलिए शक्तियों की संख्या बारह हैं। वे इस प्रकार हैं— (क) सृष्टि-सृष्टि, सृष्टि स्थिति, सृष्टि संहार, सृष्टि अनाख्या। (ख) स्थिति सृष्टि, स्थिति-स्थिति, स्थिति संहार, स्थिति अनाख्या। (ग) संहार सृष्टि, संहार स्थिति, संहार-संहार, संहार अनाख्या। २. अनुत्तर चक्र ( द्वादशारत्मक ) चक्षु आदि द्वार से बाहर जाता है और विषय का रूप धारण कर लेता है। जो विषय का रूप है वह सोमात्मक प्रमेय है, इन्द्रिय उस समय प्रमाण है और वह सूर्यात्मक है और विषय का ग्राहक हो प्रमाता है जो अग्नि आत्मक है। प्रमाता के द्वारा विषयों का अवभासना ही सृष्टि है। विषय की भासना के बाद कुछ क्षण तक वह विषय को अनुराग से देखता है, यही स्थिति है। इसके बाद 'मैंने इसे जान लिया हूँ' इस प्रकार उसे अपने में उपसंहृत कर लेता है—यही संहार है। अन्त में सभी चिदग्नि में स्थापित करता है—यही अनुत्तर है। ३. भावों के नाश के अनन्तर वासना रूप में अर्थात् संस्कार के रूप में उनकी स्थिति रहती है, इसलिए उनका भी अग्निज्वाला में लीन करना चाहिए।