भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

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आ. ५ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ४१ प्राण स्थूल और सूक्ष्मरूप है, जिनमें पहला ( स्थूल प्राण ) उच्चारण- स्वभाव है। उच्चारण का अर्थ प्राण आदि पाँच प्रकार वृत्तियाँ हैं। सूक्ष्म प्राण वर्णात्मक है—जिसके बारे में आगे बतलायेंगे। शरीर जो विशेष प्रकार के अवयव सन्निवेश रूपहै उसे करण कहा जाता है। घट आदि जो घड़ा, स्थण्डिल लिङ्ग आदि के पूजन में उपयोगी उपायों के रूप में वर्णित किये जायेंगे, वे बाहरी साधन हैं। उनमें जो ध्यान है यहाँ उचित समझकर उसके स्वरूप के सम्बन्ध में उपदेश करेंगे। यह् जो स्वप्रकाश सब तत्त्वों के अन्तरङ्ग¹ जिसे परमतत्त्व कहा गया है उसे अपने हृदयरूपी बोध में ध्यान करने के बाद उसी स्थान में प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय रूप अग्नि, सूर्य, सोम में आत्मभिमान रहने पर करण, मुद्रा, आसन आदि विकल्पों को हटाने के लिए उपयोगी साधन समझे जाते हैं। प्राण दो प्रकार है—एक सामान्य रूप और दूसरा विशेष। यही विशेष प्राण, प्राण अपान, समान, उदान और व्यान रूप वृत्तियाँ हैं। यह विशेष प्राण सामान्य प्राण में आश्रित होकर पाँच वृत्तियों के रूप में शरीर के भिन्न-भिन्न कार्यों का सम्पादन करता है, इसका स्वभाव उच्चारण है। सामान्य प्राण स्पन्द, स्फुरत्ता आदि नामों से परिचित है। संवित् ही सृष्टि के प्रथम उन्मेष के समय शून्यता को प्रकट करने के बाद प्राण रूप धारण करता है। १. चैतन्य-स्वभाव परासंवित् स्वप्रकाश है। वही अपनी स्वातन्त्र्य से सर्वतत्त्व- मय है, अर्थात् भिन्न-भिन्न रूपों में वही प्रकाशमान हैं। उन्हें अपने हृदय में ध्यान करना चाहिए। हृदय ही सब तत्त्वों का अन्तरतम है। योगो को अवधानता के साथ प्राण, अपान और उदानरूपी सोम, सूर्य और अग्नि के सामरस्य का ध्यान करना चाहिए। इस प्रकार ध्यान कुम्भक वृत्ति के द्वारा इस प्रकार अनुसन्धान करना चाहिए कि प्राण अपान और उदान सब अपनी विशिष्ट वृत्तियों को छोड़ कर अभिन्न हो गये हैं। अरणि के मन्थन से जैसे अग्नि प्रज्ज्वलित हो उठती है उसी प्रकार प्राण और अपान की विरोधी गति मध्यधाम के प्रवेश के साथ-साथ महाभैरव रूपी उदान वह्नि का रूप धारण कर प्रज्ज्वलित हो उठी है। उस अग्निज्वाला में परिच्छिन्न प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय भी परिच्छिन्नता को छोड़कर परप्रमाता के साथ तादात्म्य प्राप्त कर लिया है—इस प्रकार ध्यान होना चाहिए।