तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआणव उपाय उस विषय में जब विकल्प बिना किसी उपाय के अपने में अपना संस्कार कर सकता है, तब वह जीव पशुजनों¹ के द्वारा किये जानेवाले कार्यों से मुक्त होकर शुद्ध विद्या के अनुग्रह से शक्तिरूप धारण करता है, जिसके फलस्वरूप वह शाक्तज्ञान को उपाय रूप में अपनाता है । इस विषय में पिछले आह्निक में विचार किया गया है । जब उसे अन्य कोई विकल्प उपायरूप में अपने संस्कार के लिए अपेक्षित है, तब वह बुद्धि, प्राण, शरीर, घट आदि परिच्छिन्न-स्वभाव किसी वस्तु को उपायरूप में ग्रहण करता है और अणुभाव-प्राप्त जीव में आणव ज्ञान ( संकुचित ज्ञान ) उदित कराता है। उनमें बुद्धि ध्यानात्मक है,² १. पाशबद्ध जीव ही पशु शब्द का अर्थ है । आत्मा में संकोच के आविर्भाव हो जाने से उसकी स्वाभाविक ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति भी संकुचित या परिच्छिन्न हो जाती हैं, उसके स्वभावभूत शिवत्व या पूर्णचैतन्य मानों ढक जाता है। उस समय उसे पशु या अणु कहा जाता है। आधारगत योग्यता के अनुसार अणु भी नानाप्रकार हैं। शक्तिपात को मात्रा के तारतम्य के अनुसार किसी-किसी आत्मा में स्वभाव से ही सत् तर्क का उदय नहीं होता। सत् तर्क के उदय के लिए उसे आगमों की अपेक्षा है, फिर उस आगम का निरूपण श्रीगुरु ही कर सकते हैं। आगमों के सम्यक् मनन से विशुद्ध विकल्पों का उदय होता है । लेकिन जिन साधकों में योग्यता बहुत कम है उनके मलिन विकल्पों के शोधन के लिए शुद्ध विकल्प ही पर्याप्त नहीं, उन्हें अन्य साधनों की अपेक्षा है। ये सब साधन संक्षेप में ध्यान, प्राण का आश्रयण और देह, इन्द्रिय आदि का व्यापार हैं। हमारे शरीर परमार्थ की प्राप्ति में अत्यन्त स्थूल साधन है--देह में जिनका आत्मभिमान प्रबल है उनके लिए शरीर को भी बाह्य साधन माना जाता है । शरीर के द्वारा क्रियात्मक मुद्रा आदि सम्पन्न होता है । २. ध्यान बुद्धि का कार्य है। बुद्धि के स्तर में जिसका आत्मबोध प्रबल है उसके लिए ध्यान ही उत्तम साधन है। उसी प्रकार प्राणमय भूमि में आत्मभिमान रखने वालों के लिए उच्चारण ही प्रधान उपाय है । शरीर