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तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

आ. ५ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ४१ प्राण स्थूल और सूक्ष्मरूप है, जिनमें पहला ( स्थूल प्राण ) उच्चारण- स्वभाव है। उच्चारण का अर्थ प्राण आदि पाँच प्रकार वृत्तियाँ हैं। सूक्ष्म प्राण वर्णात्मक है—जिसके बारे में आगे बतलायेंगे। शरीर जो विशेष प्रकार के अवयव सन्निवेश रूपहै उसे करण कहा जाता है। घट आदि जो घड़ा, स्थण्डिल लिङ्ग आदि के पूजन में उपयोगी उपायों के रूप में वर्णित किये जायेंगे, वे बाहरी साधन हैं। उनमें जो ध्यान है यहाँ उचित समझकर उसके स्वरूप के सम्बन्ध में उपदेश करेंगे। यह् जो स्वप्रकाश सब तत्त्वों के अन्तरङ्ग¹ जिसे परमतत्त्व कहा गया है उसे अपने हृदयरूपी बोध में ध्यान करने के बाद उसी स्थान में प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय रूप अग्नि, सूर्य, सोम में आत्मभिमान रहने पर करण, मुद्रा, आसन आदि विकल्पों को हटाने के लिए उपयोगी साधन समझे जाते हैं। प्राण दो प्रकार है—एक सामान्य रूप और दूसरा विशेष। यही विशेष प्राण, प्राण अपान, समान, उदान और व्यान रूप वृत्तियाँ हैं। यह विशेष प्राण सामान्य प्राण में आश्रित होकर पाँच वृत्तियों के रूप में शरीर के भिन्न-भिन्न कार्यों का सम्पादन करता है, इसका स्वभाव उच्चारण है। सामान्य प्राण स्पन्द, स्फुरत्ता आदि नामों से परिचित है। संवित् ही सृष्टि के प्रथम उन्मेष के समय शून्यता को प्रकट करने के बाद प्राण रूप धारण करता है। १. चैतन्य-स्वभाव परासंवित् स्वप्रकाश है। वही अपनी स्वातन्त्र्य से सर्वतत्त्व- मय है, अर्थात् भिन्न-भिन्न रूपों में वही प्रकाशमान हैं। उन्हें अपने हृदय में ध्यान करना चाहिए। हृदय ही सब तत्त्वों का अन्तरतम है। योगो को अवधानता के साथ प्राण, अपान और उदानरूपी सोम, सूर्य और अग्नि के सामरस्य का ध्यान करना चाहिए। इस प्रकार ध्यान कुम्भक वृत्ति के द्वारा इस प्रकार अनुसन्धान करना चाहिए कि प्राण अपान और उदान सब अपनी विशिष्ट वृत्तियों को छोड़ कर अभिन्न हो गये हैं। अरणि के मन्थन से जैसे अग्नि प्रज्ज्वलित हो उठती है उसी प्रकार प्राण और अपान की विरोधी गति मध्यधाम के प्रवेश के साथ-साथ महाभैरव रूपी उदान वह्नि का रूप धारण कर प्रज्ज्वलित हो उठी है। उस अग्निज्वाला में परिच्छिन्न प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय भी परिच्छिन्नता को छोड़कर परप्रमाता के साथ तादात्म्य प्राप्त कर लिया है—इस प्रकार ध्यान होना चाहिए।

४२ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ५ इन तीनों के सामरस्य का ध्यान करना चाहिए। यह ध्यान तब तक चलता रहे जब तक महाभैरव रूप अग्नि ध्यान के पवन से ज्वाला रूप धारण कर ले। वह अग्नि पहले आलोचित ( तृतीय आह्निक में ) द्वादश शक्तिरूप¹ शिखाओं से घिरी हुई है और चक्ररूपी है और आँखें आदि किसी एक छिद्र रूपी दरवाजे से बाहर निकल कर ग्राह्य वस्तु में विश्राम लेती हैं—ऐसा चिन्तन करना चाहिए। बाहर विश्रान्त उस तत्त्व द्वारा वह बाहरी दृश्य पहले सोमरूप सृष्टि क्रम से आपूरित, उसके बाद सूर्यरूप स्थिति से अवभासित उसके अनन्तर संहाररूप अग्नि के द्वारा विलयन और अन्त में उसे अनुत्तर² स्वभाव में स्थापित करता है—ऐसा ध्यान करना चाहिए। इस प्रकार वह चक्र सब बाहरी वस्तुओं के साथ अभिन्न होकर परिपूर्ण होता है। इसके बाद वासनारूप³ में स्थित सभी भावों को उस चक्र के साथ ( इस प्रकार अनुत्तरतारूप प्रदान करते हुए ) ध्यान करना चाहिए। इस प्रकार निरन्तर ध्यान करनेवाले को सृष्टि, १. चतुर्थ आह्निक में चक्रेश्वररूपी परप्रमाता का जो उल्लेख हुआ वह द्वादश शक्तियों से परिवेष्टित है ऐसा कहा गया है। वे शक्तियाँ सृष्टि, स्थिति, संहार से सम्बन्धित हैं, प्रत्येक स्थिति के साथ जो अनवच्छिन्न चतुर्थ है और जिसे अनाख्या कहते हैं उसका सम्बन्ध वर्तमान है, इसलिए शक्तियों की संख्या बारह हैं। वे इस प्रकार हैं— (क) सृष्टि-सृष्टि, सृष्टि स्थिति, सृष्टि संहार, सृष्टि अनाख्या। (ख) स्थिति सृष्टि, स्थिति-स्थिति, स्थिति संहार, स्थिति अनाख्या। (ग) संहार सृष्टि, संहार स्थिति, संहार-संहार, संहार अनाख्या। २. अनुत्तर चक्र ( द्वादशारत्मक ) चक्षु आदि द्वार से बाहर जाता है और विषय का रूप धारण कर लेता है। जो विषय का रूप है वह सोमात्मक प्रमेय है, इन्द्रिय उस समय प्रमाण है और वह सूर्यात्मक है और विषय का ग्राहक हो प्रमाता है जो अग्नि आत्मक है। प्रमाता के द्वारा विषयों का अवभासना ही सृष्टि है। विषय की भासना के बाद कुछ क्षण तक वह विषय को अनुराग से देखता है, यही स्थिति है। इसके बाद 'मैंने इसे जान लिया हूँ' इस प्रकार उसे अपने में उपसंहृत कर लेता है—यही संहार है। अन्त में सभी चिदग्नि में स्थापित करता है—यही अनुत्तर है। ३. भावों के नाश के अनन्तर वासना रूप में अर्थात् संस्कार के रूप में उनकी स्थिति रहती है, इसलिए उनका भी अग्निज्वाला में लीन करना चाहिए।

आ. ५ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ४३ स्थिति और संहार रूप कार्य समूह अपने संवित् ही जिसका परमतत्त्व है और परम स्वरूप सृष्टि आदि कार्य करनेवाली स्वातन्त्र्य शक्तिरूप स्वसंवित् ही है—इस प्रकार दृढ़ निश्चय होने पर उसे तत्काल ही भैरव- भाव आ जाता है। इसके अभ्यास से सभी ईप्सित सिद्धियाँ भी होती हैं। माता, मान और मेय रूपी तीन स्थितियों को अपने स्वरूप में रख कर स्थित है, उस स्वप्रकाश, और जो सभी के आत्मस्वरूप हैं उन्हें अपने हृदयरूप आनन्दधाम में ध्यान करना चाहिए। उन द्वादश महाशक्तिरूप रश्मियों के चक्रेश्वर को जो व्यापक हैं जो इन्द्रियरूपी शून्य मार्ग से बाहर निःसरणशील हैं और सृष्टि आदि भावों का जनक हैं ऐसा ध्यान करना चाहिए। उनके द्वारा सब बाह्य भावसमूह आत्मरूपी अखण्ड मण्डल में अन्तर्भाव और उसी में उनका (भावों का) विश्राम हो रहा है—योगी को इस प्रकार भावना करनी चाहिए। ऐसे होने पर आत्मस्वरूप का प्रकाश होगा। संग्रह श्लोक इस प्रकार हैं। इति ध्यानं। उच्चार¹ प्राण को उच्चारण करने के इच्छुक (ऊर्ध्व मुख प्रेरित करने के इच्छुक) मनुष्य पहले हृदयरूप शून्य² में उसे विश्राम कराता है, इसके १. प्राण के प्राणन क्रिया के सहारे कैसे अनुत्तर स्वभाव खुल जाता है उच्चार के रहस्य बतलाते हुए ग्रन्थकार उसे स्पष्ट करते हैं। प्राणात्मक उच्चार से एक अव्यक्त ध्वनि निरन्तर स्फुरित होती है, इसे अनाहत नाद कहते हैं। प्राण के उदय होने के पहले हृदय में उसकी स्थिति क्षणभर के लिए होती है। २. शून्य शब्द से अभाव को समझना चाहिए। यह अभाव सब भावों की विलयन रूप स्थिति है। हृदय भी आकाश रूप है जहाँ किसी प्रकार भाव का अस्तित्व नहीं है, संवित् ही उसका एकमात्र स्वरूप है। यहीं चैतन्य का स्वात्मभूत आनन्द विकसित रूप में है, इसलिए इस आनन्द का नाम पड़ा है निजानन्द, यह आनन्द प्रमाता के स्वरूप के अनुभव में ही स्थित है—स्वरूप के साक्षात्कार से इस आनन्द का प्रकाशन होता है।

४४ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ५ बाद बाहर प्राण का उदय होता है। वहाँ भी उस बाह्य का अपानरूपी चन्द्र के द्वारा आपूरण होने पर उसकी सर्वात्मतारूप को देखता है, उसके बाद वह दूसरे के प्रति आकांक्षा रहित होता है, उसके अनन्तर समान के उदय होने पर सब विषयों के परस्पर मेलनरूप विश्रान्ति का अनुभव करता है, उसके बाद उदानरूप अग्नि के उदय होने पर प्रमाता, प्रमेय रूप कलना का ग्रास होता है। उसके ग्रास करनेवाली अग्नि के प्रशमन हो जाने पर व्यान का उदय होता है, तब सब प्रकार की अवच्छिन्नता (संकोच) हट जाती है। इस प्रकार शून्य से व्यान तक ये जो विश्रान्तियाँ हैं उन्हें निजानन्द¹, निरानन्द², परानन्द³, ब्रह्मानन्द³, महानन्द⁴, चिदानन्दरूप⁵ छः आनन्दभूमियों के रूप में उपदेश किये गये हैं जिनका १. चैतन्यशक्ति शून्यता के अवभासना के बाद प्राणरूप धारण करती है। प्राण जड़ और चेतन दोनों धर्मों से युक्त है, क्योंकि परमेश्वर ने अन्य जड़ों से भिन्न बनाकर इसमें अपनी अहन्ता रूप कर्तृत्व प्रदान किया है और इसे ग्राहक बनाया है। यही प्राण प्रमातृ भूमि में निजानन्द रूप है, लेकिन जब प्रमाता प्रमाण भूमि को स्पर्श करता हुआ प्रमेय की ओर आगे बढ़ता है अर्थात् प्राण जब स्वल्प मात्रा में बहिर्मुख होता है तब उस आनन्द का नाम पड़ता है निरानन्द क्योंकि उस समय वह प्रमातृगत आनन्द से रहित हो जाता है। २. परानन्द—प्रमेय वस्तु के उदय होने पर इस प्रकार आनन्द की भावना होनी चाहिए। अपान के उदय से प्रमेय का उदय माना जाता है। प्रमेय के उदय के कारण भिन्नता आ जाती है इसलिए यह आनन्द निजी नहीं आत्मा से किञ्चित् भिन्न का है—इसलिए इसे परानन्द कहते हैं। ३. समान भूमि में समग्र प्रमेय घुलमिलकर एक बन जाता है। उस समय उनके परस्पर के सम्मिलन से जिस आनन्द का विकास होता है उसमें बृहत्त्व और बृंहितत्व दोनों गुणों के समावेश के कारण उसे ब्रह्मानन्द कहा जाता है। ४. प्राण और अपानों के प्रतिदिन की जो कलनाएँ हैं, जिसकी संख्या २१६०० हैं, योगी मध्यमार्ग में उन्हें विलयन कर सकने पर वही प्राण उदान रूप धारण करता है। उदान वह्निरूप है, उस समय प्रमातृगत आनन्द का अनुभव होता है—उसे स्वात्म-विमर्शमय रूप में चिन्तन करना चाहिए। इसका नाम महानन्द है। ५. उपर्युक्त महानन्द के विश्राम के अनन्तर महाव्याप्ति का उदय होता है।

आ. ५ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ४५ एक अनुसन्धाता है। उसका न तो उदय है न अस्त, अन्तर्विश्रान्ति ही जिसका परमरूप है, वह जगदानन्द है। इन उच्चारभूमियों में प्रत्येक को दो-दो बार अथवा सम्पूर्ण रूप से विश्रान्त करा कर शरीर और प्राणों से भिन्न विश्रान्ति का स्वरूप का अनुभव (योगी) प्राप्त करता है। विश्रान्ति तत्त्व ही सृष्टि और संहार बीज¹ के उच्चारण का रहस्य है—इसके अनुसन्धान करते हुए उसे विकल्पों का संहार करना चाहिए। इन विश्रान्तियों के प्रत्येक में पाँच-पाँच स्थितियाँ हैं जो प्रवेश के तार- तम्य के कारण उदित होती हैं। उसमें प्रागानन्द² (चमत्कार विशेष है) क्योंकि उस समय पूर्णता का स्पर्श हो जाता है। इसके बाद उद्भव है— उस समय सब प्रकार उपाधिरहित व्यान के उदय के साथ-साथ सब जड़ों से सम्पर्कहीन चिदानन्द का अनुभव होने लगता है। १. सृष्टि बीज 'स' कार है और संहार बीज 'ह' कार है। २. प्रागानन्द, उद्भव, कम्प, निद्रा, घूर्णि ये पाँच पारिभाषिक शब्द हैं। जिनकी व्याख्या निम्न प्रकार है। शरीर आदि को साधन बनाकर परम तत्त्व में प्रवेश पाने के इच्छुक योगी, पूर्णता के प्रति उन्मुख होते ही एक प्रकार आनन्द का अनुभव करते हैं। उनमें वास्तविक उन्मुखता की स्थिति आ जाने पर पहले आनन्द रूप चमत्कार-विशेष निज अनुभव में आता है। यह पहली स्थिति है। उसके बाद बिजली के क्षणिक प्रकाश से जैसे सभी वस्तुएँ एक-सी हो जाती हैं—सभी प्रकाशमय हो जाते हैं; उसी प्रकार योगी के शरीर में जो आत्मबोध पहले विद्यमान था वह उस क्षणिक प्रकाश से कट जाता है। इसे ग्रन्थिभङ्ग के रूप में वर्णित किया जा सकता है। ग्रन्थिभङ्ग के साथ-साथ नीचे की भूमि के साथ जो सम्बन्ध पहले था वह कट जाता है और योगी परधाम की ओर बढ़ता है—यह ऊर्ध्वगमन रूप है। इसे उद्भव कहते हैं। यह क्षणभर के लिए उत्पन्न होता है, बराबर के लिए होने पर परिपूर्णता आ जाती है, लेकिन इससे योगी का विशेष लाभ अवश्य होता है। इस क्षणिक स्पर्श से संवित् के जो अहन्तारूप बल है और जो आत्मा में आत्माभिमान रूप है उसका उदय होता है। इसके फलस्वरूप अनात्मा में आत्माभिमान गलने लगता है, पारिभाषिक शब्द से इसे कम्प कहते हैं। निद्रा के समय वाह्य वृत्ति का उपरम होता है और आन्तर विषय भी उस समय अस्फुट रहता है, उसी प्रकार योगी को भी संवित् के साथ

४६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ५ उस समय क्षणभर के लिए अपने अन्दर शरीर सम्बन्धी दृढ़ भावना कट जाती हैं, उसके बाद कम्प है जिसके उदय से अर्थात् उसके बल के द्वारा शरीर विषयक तादात्म्यबोध शिथिल हो जाता है । इसके बाद निद्रा है, क्योंकि उस समय बहिर्मुखता का विलयन हो जाता है । इस प्रकार अनात्म-विषयों में आत्मभाव कट जाने पर आत्मा की सर्वमयता के कारण आत्मा में अनात्मभाव विलीन होता है। इसलिए इसके बाद घूर्णि है, क्योंकि उस समय महाव्याप्ति का उदय हुआ है। ये सब जाग्रत आदि भूमियां १ हैं, तुर्यातीत जिनका अन्त है। ये भूमियाँ त्रिकोण, कन्द, हृदय, तालु और ऊर्ध्वकुण्डली आदि चक्रों के प्रवेश के समय अनुभव में आते हैं। इस प्रकार उच्चारण के विश्रान्तियों में निखिल वेद्य जहाँ विलीन हो गया है, जहाँ वेद्य उन्मेषभाव को प्राप्त कर रहा है, जहाँ वेद्य उन्मिषित है--ये तीन स्थितियाँ तीन प्रकार के लिङ्गरूप २ हैं जिसके बारे में अनुकूल समय पर आगे बतलायेंगे। परलिङ्ग योगिनी हृदय रूप है। इनमें जो मुख्य है वह स्पन्द स्वरूप है, जब संकोच और विकासात्मक स्वरूप की प्राप्ति होती है तब यामलरूप का उदय होता है और अन्त में तादात्म्य के अनुभव होने के पहले इस प्रकार की निद्रा स्थिति के सम्मुख होना पड़ता है। यह स्थिति सामयिक है। इसके अनन्तर परासंवित् ही सब वस्तुओं का परम स्वरूप है, उससे अतिरिक्त कुछ भी नहीं है—इस प्रकार स्थिति के उदय के साथ-साथ ऊर्ध्व गति का अवसान हो जाता है और योगी परासंवित् के साथ तदात्मता प्राप्त करता है। इसे घूर्णि कहते हैं, यह महाव्याप्ति रूपी है। १. किन-किन भूमियों में प्रागानन्द आदि विभिन्न प्रकार के अनुभव होते हैं उनका निर्देश ग्रन्थकार ने दिया है—(१) त्रिकोण है जिसे मूलाधार कहते हैं, (२) कन्द है जो उद्भव स्थान है, (३) कम्प का स्थान हृदय है, (४) तालु स्थान निद्रा का, ५. घूर्णि ऊर्ध्वकुण्डली या द्वादशान्त है। २. लिङ्ग तीन हैं—(१) व्यक्त, (२) व्यक्ताव्यक्त, (३) अव्यक्त। सब प्रकार की गतियों के विराम होने पर जो स्पन्ददशा का उदय होता है वही अव्यक्त लिङ्ग का स्वरूप है। इसी दशा से विश्व का उदय और विलयन होते हैं, इसलिए इसे लिङ्ग कहते हैं। व्यक्ताव्यक्त लिङ्ग 'इदमहं' प्रतीति रूप है। व्यक्तलिङ्ग विशेष स्पन्दरूप है।

आ. ५ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ४७ विसर्ग कला रूप विश्राम की प्राप्ति होती है। अब अधिक कहने से विरत रहता हूँ। इसमें अनुप्रवेश का मार्ग अप्रकाशनीय है। ✕ ✕ ✕ जो पूर्ण हैं वह अपने बोध में स्थित है, इसके अनन्तर प्रमेय में विश्राम लेकर मेय का आपूरण कर देते हैं, अन्त में मातृ मेय आदि विभागों को वह शीघ्र ही पूर्णस्वभाव में संहार करता है। ✕ ✕ + व्याप्ति के द्वारा जो विश्रान्ति आती है वे सब शून्य के साथ छः उपाय रूप भूमियाँ हैं। प्राण से लेकर व्यान जिसका अन्त है उनमें जाग्रत् आदि प्रपञ्च अन्तर्गत हैं। ✕ ✕ ✕ इस विषय में अभ्यासशील व्यक्ति सृष्टि संहार रूप विमर्शधाम में बिना बिलम्ब से आरूढ़ हो सकता है। ✕ ✕ ✕ इस विषय में अन्तर्गत श्लोक इतने हैं। उच्चारण की इति यहाँ है। अब सूक्ष्म प्राणात्मक वर्ण का विवरण है। इस उच्चारण में अव्यक्त की अनुकरण करने वाली ध्वनि जो निरन्तर स्फुरित होती है¹ वर्ण कहते हैं। सृष्टि और संहार बीज ही उसका १. प्राण की गति दो प्रकार हैं—एक स्पन्दरूप है और स्वाभाविक है और दूसरा क्रियात्मक तथा प्रयत्नजन्य है। प्राणात्मक उच्चार से एक अव्यक्त ध्वनि सदा ही स्फुरित होती रहती है जिसे अनाहत नाद कहते हैं। प्राणिमात्र के हृदय में यह स्वभाव से सर्वदा चलता रहता है—इसके उच्चारण करने वाला कोई नहीं है, न तो इसके रोकने वाला कोई है। अविभक्त रूप में सब वर्ण इसमें रहते हैं। यह सब वर्णों के कारण भी हैं, इसलिए अनाहत नाद भी वर्णपद वाच्य है। नाद के दो विभाग दृष्टिगोचर होते हैं—एक जो सदा प्रकाशमान है और जिसका तिरोभाव कभी नहीं होता ! इसका उदय ही होता है, अस्त नहीं होता। इसका जो दूसरा रूप है जो अपेक्षाकृत कम सूक्ष्म है, उसका उदय तथा अस्त दोनों ही हैं। नाद का जो सूक्ष्म रूप है जिसे सब वर्णों के अविभक्त रूप में वर्णित किया गया है वह अव्यक्त है। सृष्टि और

४८ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ५ स्वरूप है। उसके अभ्यास से परासम्वित् की प्राप्ति होती है। जैसे 'क' से 'स' तक वर्णों को स्वर के साथ या बिना स्वर से प्राण के साथ हृदय से उच्चारण करने पर या स्मरण करने पर संवित्-स्पर्श का अनुभव होता है। समय¹ की अपेक्षा न होने के कारण यह परिपूर्ण है, समय की अपेक्षा रखने वाले शब्द भी (अर्थात् लौकिक शब्द ) तत्तत् विषयों की भावना करने वालों को मन के द्वारा कल्पित राज्य के समान ( विषय को ) प्राप्त कराता है।² अनुत्तर-संवित् के स्पर्श से हृत् ( अ ), कण्ठ ओष्ठ ( औ ), दो द्वादशान्त और हृदय को एक बनाना चाहिए—वर्णों का यही रहस्य है। किसी-किसी का कथन है कि हृदय में स्फुरित विमर्श से उद्भूत श्वेत पीत आदि आन्तर वर्ण की भावना ही संवित् को अनुभव में लाते हैं। × × × संवित् रूप स्पन्द से जिसमें वाच्य के अभाव होने के कारण सोम और सूर्य की गतियों के निरोध के द्वारा चिद्बीज और पिण्ड वर्ण विधि में समान रूप में प्रवेश होने पर पूर्णता आ जाती है। यह आन्तर श्लोक है। वर्णविधि की समाप्ति यहाँ है। मुद्रा सम्बन्धी विचार के समय करण की चर्चा करेंगे। संहार बीज ही उसका मुख्य रूप है, अर्थात् इन दो बीजों का रूप धारण कर नाद अभिव्यक्त होता है। इसलिए इन दोनों बीजों के सहारे नाद का परामर्श होना चाहिए । १. जैसे जब कोई वृद्ध पुरुष किसी बालक को घट से परिचित कराते समय 'पृथुबुध्न उदर' युक्त किसी आकार को दिखलाकर 'यह इसका अभिधेय है' इस प्रकार जो कल्पित वाच्यवाचक रूप सम्बन्ध डालता है उसे ही समय कहते हैं । इस समय को ही संकेत कहते हैं । २. घट आदि शब्द के उच्चारण करते हुए पुरुष भी अपनी संवित् में घट आदि का साक्षात्कार करता है, जैसे कोई पुरुष काम या शोक से पीड़ित होकर कान्ता सम्बन्धी गम्भीर भावना के कारण कान्ता रूप को सामने प्रत्यक्ष देखता है। सान्त वर्ण समूह संवित् के साथ अभिन्न हैं, इसलिए सृष्टि आदि बीजों से अभिव्यक्त होने वाले नाद का पुनः-पुनः उच्चारण तथा स्मरण करने पर योगी चित् स्वरूप के साथ एकात्मता का अनुभव करता है ।

आ. ५ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ४९ किसी-किसी का विकल्प बिना कोई उपाय से पूर्णता को प्राप्त करता है, और किसी का उपाय से संस्कार प्राप्त कर लेता है। वे उपाय भी नाना प्रकार है। बुद्धि प्राण तथा शरीर में उसके बाद बाहर संकुचित रूप में इसका निर्णय किया गया है, लेकिन परमफल की प्राप्ति के विषय में इनकी कोई भिन्नता नहीं है। इति तन्त्रसार पञ्चम आह्निक। ४

अथ षष्ठमाह्निकम् अथ बाह्यविधिः स एव स्थानप्रकल्पनशब्देन उक्तः, तत्र त्रिधा स्थानं—प्राणवायुः शरीरं बाह्यं च, तत्र प्राणे तावत् विधिः, सर्वः असौ वक्ष्यमाणः अध्वा प्राणस्थः कल्प्यते, तस्य क्रमाक्रमकलनैव कालः, स च परमेश्वर एव अन्तर्भाति, तद्भासनं च देवस्य काली नाम शक्तिः, भेदेन तु तदाभासनं क्रमाक्रमयोः प्राणवृत्तिः । संविदेव हि प्रमेयेभ्यो विभक्तं रूपं गृह्णाति, अत एव च अवच्छेदयोगात् देह्यतां यान्ती नभः, ततः स्वातन्त्र्यात् मेये स्वीकारौत्सुक्येन निपतन्ती क्रियाशक्तिप्रधाना प्राणनारूपा जीवस्वभावा पञ्चभी रूपैः देहं यतः पूरयति, ततोऽसौ चेतन इव भाति । तत्र क्रिया- शक्तौ कालाध्वा, तत्र वर्ण-मन्त्र-पदाध्वनः कालाध्वनि स्थितिः पर-सूक्ष्म- स्थूलरूपत्वात् । देशाध्वस्थितिस्तु तत्त्व-पुर-कलात्मना इति भविष्यति स्वावसरे । तत्र यद्यपि देहे सबाह्याभ्यन्तरम् ओतप्रोतरूपः प्राणः, तथापि प्रस्फुटसंवेद्यप्रयत्नः असौ हृदयात्प्रभृति इति, तत एव अयं निरूपणीयः । तत्र प्रभुशक्तिः आत्मशक्तिः यत्न इति त्रितयं प्राणेरणे हेतुः—गुणमुख्यभावात् । तत्र हृदयात् द्वादशान्तान्तं स्वाङ्गुलैः सर्वस्य षट्त्रिंशदङ्गुलः प्राणचारः निर्गमे प्रवेशे च, स्वोचितबलप्रयत्नहेतुत्वात् सर्वस्य । तत्र घटिका तिथिः मासो वर्षं च वर्षसमूहात्मा, इति समस्तः कालः परिसमाप्यते । तत्र सपञ्चांशे अङ्गुले चषक इति स्थित्या घटिकोदयः घटिका हि षष्ट्या चषकैः तस्मात् द्वासप्तत्यङ्गुला भवति । अथ तिथ्युदयः । सपादमङ्गुलद्वयं त्रुटिः उच्यते, तासु चतसृषु प्रहरः, त्रुटयर्धं त्रुटयर्धं तत्र संध्या, एवं निर्गमे दिनं, प्रवेशे रात्रिः, इति तिथ्युदयः । अथ मासोदयः । तत्र दिनं कृष्णपक्षः, रात्रिः शुक्लः, तत्र पूर्वं त्रुटयर्धं अन्त्यं च त्रुटयर्धं विश्रान्तिः अकालकलिताः, मध्यास्तु पञ्चदश त्रुटय एव तिथयः, तत्र प्रकाशो विश्रान्तिश्च इति एते एव दिननिशे । तत्र वेद्यकथताप्रकाशो दिनं, वेद्यस्य विचारयितरि लयो रात्रिः, ते च प्रकाशविश्रान्ती चिराचिरवैचित्र्यात् अनन्तभेदे, तत्साम्ये तु विषुवत् ।

आ. ६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ५१ तत्र कृष्णपक्षे प्राणार्के अपानचन्द्र आप्यायिकाम् एकामेकां कलाम् अर्पयति, यावत् पञ्चदश्यां त्रुटौ द्वादशान्तसमीपे क्षीणपृथग्भूतकलाप्रसरः चन्द्रमाः प्राणार्क एव लीयते। तदनन्तरं यत् त्रुट्यर्धं स पक्षसंधिः । तस्य च त्रुट्यर्धस्य प्राच्यम् अर्धम् आमावस्यं, द्वितीयं प्रातिपदं । तत्र प्रातिपदे तस्मिन् भागे स आमावस्यो भागो यदा कासप्रतन्नावधानादि- कृतात् तिथिच्छेदात् विशति तदा तत्र ग्रहणम्, तत्र च वेद्यरूपसोम- सहभूतो मायाप्रमातृराहुः स्वभावतया विलापनाशक्तः केवलम् आच्छादनमात्रसमर्थः सूर्यगतं चान्द्रं अमृतं पिबति इति । प्रमातृप्रमाण- प्रमेयत्रितयाविभागकारित्वात् स पुण्यः कालः पारलौकिकफलप्रदः । ततः प्रविशति प्राणे चिदर्क एकैकया कलया अपानचन्द्रम् आपूरयति, यावत् पञ्चदशी त्रुटिः पूर्णिमा, तदनन्तरं पक्षसंधिः ग्रहणं च इति प्राग्वत्, एतत् तु ऐहिकफलप्रदम्, इति मासोदयः । अथ वर्षोदयः । तत्र कृष्णपक्ष एव उत्तरायणं षट्सु अङ्गुलेषु संक्रान्तिः मकरात् मिथुनान्तं । तत्र प्रत्यङ्गुलं पंच तिथयः तत्रापि दिनरात्रिविभागः, एवं प्रवेशे दक्षिणायनं, गर्भत्वम्, उद्भवेच्छा, उद्बुभूषुता, उद्भविष्यत्वम्, उद्भवारम्भः, उद्भवत्ता, जन्मादिविकार- षट्कं च इति क्रमात् मकरादिषु इति । तथैव उपासा अत्र फलं समुचितं करोति। अत्र च दक्षाद्याः पितामहान्ता रुद्राः शक्तयश्च द्वादशाधिपतय, इति वर्षोदयः । प्रत्यङ्गुलं षष्टिः तिथय इति क्रमेण संक्रान्तौ वर्षम् इत्यनेन क्रमेण प्रवेशनिर्गमयोः द्वादशाब्दोदयः, प्रत्यङ्गुलं तिथीनां शतत्रयं, सपंञ्चां- शेऽङ्गुले वर्षं, यत्र प्राक् चषकम् उक्तम् इति गणनया संक्रान्तौ पञ्च वर्षाणि, इति अनया परिपाट्या एकस्मिन् प्राणनिगमप्रवेशकाले षष्ट्यब्दोदयः, अत्र एकविंशतिसहस्राणि षट् शतानि इति तिथीनां संख्या । तावती एव अहोरात्रे प्राणसंख्या, इति न षष्ट्यब्दोदयात् अधिकं परीक्ष्यते आनन्त्यात् । तत्र मानुषं वर्षं देवानां तिथिः, अनेन क्रमेण दिव्यानि द्वादशवर्षसहस्राणि चतुर्युगम् । चत्वारि त्रीणि द्वे एकम् इति कृतात् प्रभृति तावद्भिः शतैः अष्टौ संध्याः। चतुर्युगानाम् एकसप्तत्या मन्वन्तरम्, मन्वन्तरैः चतुर्दशभिः ब्राह्मं दिनं, ब्रह्मदिनान्ते कालग्निसंधे लोकत्रये अन्यत्र च लोकत्रये धूमप्रस्वापिते सर्वे जना वेगवदग्निप्रेरिता जनलोके प्रलयाकलीभूय तिष्ठन्ति । प्रबुद्धास्तु कूष्माण्डहाकेशाद्या

महोलोके क्रीडन्ति । ततो निशासमाप्तौ ब्राह्मी सृष्टिः। अनेन मानेन वर्षशतं ब्रह्मायुः । तत् विष्णोः दिनं तावती च रात्रिः, तस्यापि शतम् आयुः । तत् दिनं तदूर्ध्वं रुद्रलोकप्रभो रुद्रस्य, तावती रात्रिः, प्राग्वत् वर्ष, तच्छतमपि च अवधिः । तत्र रुद्रस्य तदवसितौ शिवत्वगतिः, रुद्रस्य उक्ताधिकारःवधिः, ब्रह्माण्डधारकाणां तत् दिनं शतरुद्राणां, निशा तावती तेषामपि च शतमायुः । शतरुद्रक्षये ब्रह्माण्डविनाशः । एवं जलतत्त्वात् अव्यक्तान्तम् एतदेव क्रमेण रुद्राणाम् आयुः । पूर्व- स्यायुर्उत्तरस्य दिनम् इति । ततश्च ब्रह्मा रुद्राश्च अबाद्यधिकारिणः अव्यक्ते तिष्ठन्ति इति । श्रीकण्ठनाथश्च तदा संहर्ता । एषोऽवान्तरप्रलयः तत्क्षये सृष्टिः । तत्र शास्त्रान्तर-मुक्ता अपि सृज्यन्ते । यत्तु श्रीकण्ठनाथ- स्य स्वम् आयुः तत् कञ्चुकवासिनां रुद्राणां दिनं, तावती रजनी, तेषां यदायुः तत् गहनेशदिनं, तावती एव क्षपा, तस्यां च समस्तमेव मायायां विलीयते । पुनः गहनेशः सृजति । एवं यः अव्यक्तकालः तं दशभिः परार्धैः गुणयित्वा मायादिनं कथयेत्, तावती रात्रिः । स एव प्रलयः । मायाकालः परार्धशतेन गुणित ऐश्वरतत्त्वे दिनम् । अत्र प्राणो जगत् सृजति, तावती रात्रिः, यत्र प्राणप्रशमः, प्राणे च ब्रह्मबिलधाम्नि शान्तेऽपि या संवित्, तत्राप्यस्ति क्रमः । ऐश्वरे काले परार्धशतगुणिते या संख्या, तत् सादाशिवं दिनं, तावती निशा, स एव महाप्रलयः । सदाशिवः स्वकालपरिक्षये बिन्द्वर्धचन्द्रनिरोधिका आक्रम्य नादे लीयते, नादः शक्तितत्त्वे, तत् व्यापिन्यां, सा च अनश्रितदिनं । अनाश्रितः सामनसे पदे यत् तत् सामनस्यं साम्यं तत् ब्रह्म । अस्मात् सामनस्यात् अकल्यात् कालात् निमेषोन्मेषमात्रतया प्रोक्ताशेषकालप्रसरप्रविलयचक्र- भ्रमोदयः । एकं दश शतं सहस्रम् अयुतं लक्षं नियुतं कोटिः अर्बुदं वृन्दं खर्वं निखर्वं पद्मं शङ्कुः समुद्रं अन्त्यं मध्यम् परार्धम् इति क्रमेण दशगुणि- तानि अष्टादश, इति गणितविधिः । एवम् असंख्‍याः सृष्टिप्रलयाः एकस्मिन् महासृष्टिरूपे प्राणे, सोऽपि संविदि, सा उपाधौ, स चिन्मात्रे, चिन्मात्र- स्यैव अयं स्पन्दो-यदयं कालोदयो नाम। तत एव स्वप्नसंकल्पादौ वैचित्र्यम् अस्य न विरुद्धावहम् । एवं यथा प्राणे कालोदय,, तथा अपानेऽपि हृदयात् मूलपीठपर्यन्तम् । यथा च हृत्कण्ठ-तालु-ललाट-रन्ध्र- द्वादशान्तेषु ब्रह्म-विष्णु-रुद्रेश-सदाशिवानाश्रिताख्यं कारणषट्कम्, तथैव अपानेऽपि हृत्कन्दानन्द-संकोच-विकास-द्वादशान्तेषु, बाल्य-यौवन-वार्धक- निधन-पुनर्भवमुक्त्यधिपतय एते ।

आ. ६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ५३ अथ समाने कालोदयः । समानो हार्दीषु दशसु नाडीषु संचरन् समस्ते देहे साम्येन रसादीन् वाहयति । तत्र दिगष्टके संचरन् तद्दिक्पति- चेष्टाम् इव प्रमातुः अनुकारयति । ऊर्ध्वाधस्तु संचरन् तिसृषु नाडीषु गतागतं करोति । तत्र विषुवद्दिने बाह्ये प्रभातकाले सपादं घटिकां मध्यमार्गे वहति । ततो नवशतानि प्राणविक्षेपाणाम्, इति गणनया बहिः सार्धघटिकाद्वयं वामे दक्षिणे वामे दक्षिणे वामे इति पञ्च संक्रान्तय ततः संक्रान्तिपञ्चके वृत्ते पादोनासु चतुर्दशसु घटिकासु अतिक्रान्तासु दक्षिणं शारदं विषुवन्मध्याह्ने नव प्राणशतानि । ततोऽपि दक्षिणे वामे दक्षिणे वामे दक्षिणे इति संक्रान्तिपञ्चकं, प्रत्येकं नवशतानि इत्येवं रात्रावपि, इति । एवं विषुवद्दिवसे तद्रात्रौ च द्वादश संक्रान्तयः । ततो दिनवृद्धिक्षयेषु संक्रान्तिवृद्धिक्षयः । एवम् एकस्मिन् समानमरुति वर्षद्वयं श्वासप्रश्वासयोगाभावात् । अत्रापि द्वादशाब्दोदयादि पूर्ववत् । उदाने तु द्वादशान्तावधिश्चारः स्पन्दमात्रात्मनः कालस्य । अत्रापि पूर्ववत् विधिः । व्याने तु व्यापकत्वात् अक्रमेऽपि सूक्ष्मोच्छलत्तायोगेन कालोदयः । अथ वर्णोदयः । तत्र अर्धप्रहरे अर्धप्रहरे वर्णोदयो विषुवति समः, वर्णस्य वर्णस्य द्वे शते षोडशाधिके प्राणानाम्, बहिः षट्त्रिंशत् चषकाणि इति उदयः, अयम् अयत्नजो वर्णोदयः। यत्नजस्तु मन्त्रोदयः अरघट्टघटी- यन्त्रवाहनवत् एकानुसंधिबलात् चित्रं मन्त्रोदयं दिवानिशम् अनुसंदधत् मन्त्रदेवतया सह तादात्म्यम् एति । तत्र सदोदिते प्राणचारसंख्ययैव उदयसंख्या व्याख्याता, तद्द्विगुणिते तदर्धम् इत्यादिक्रमेण अष्टोत्तरशते चक्रे द्विशत उदयः, इति क्रमेण स्थूलसूक्ष्मे चारस्वरूपे विश्रान्तस्य, प्राण- चारे क्षीणे, कालग्रासे वृत्ते संपूर्णम् एकमेवेदं संवेदनं चित्रशक्तिनिर्भरं भासते । कालभेद एव संवेदनभेदकः न वेद्यभेदः शिखरस्थज्ञानवत्, ज्ञानस्य यावान् अवस्थितिकालः स एव क्षणः, प्राणोदये च एकस्मिन् एकमेव ज्ञानम्, अवश्यं चैतत्,—अन्यथा विकल्पज्ञानम् एक न किंचित् स्यात्—क्रमिकशब्दारूषितत्वात् मात्राया अपि क्रमिकत्वात् । यदाह तस्यादि उदात्तमर्धह्रस्वम् । (पा० व्या० १-२-३२) इति । तस्मात् स्पन्दान्तरं यावत् न उदितं तावत् एकमेव ज्ञानं । अत एव एकाशीतिपदस्मरणसमये विविधर्मनुप्रवेशमुखेन एक एव असौ परमेश्वरविषयो विकल्पः कालग्रासेन अविकल्पात्मा एव संपद्यते इति । एवम् अखिलं कालाध्वानं प्राणोदय एव पश्यन्, सृष्टिसंहारांश्चविचित्रान्

५४ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त अ.। ६ ] निःसंख्यान् तत्रैव आकालयन्, आत्मन एव पारमेश्वर्यं प्रत्यभिजानन् मुक्त एव भवति इति । संविद्रूपस्यात्मनः प्राणशक्तिं पश्यन्त्रूपं तन्त्रां चातिकालम् । साकं सृष्टिस्थेमसंहारचक्रै- र्नित्योद्युक्तो भैरवीभावमेति ॥ सअल पआस रुउ संवेअण, फन्दतरङ्ककण तहु पाणुर । पाणब्भन्तरम्मि परिणिट्ठउ, सअलउ कालपसरु परिआणु ॥ जह उल्लसइ जह विण्णिरुज्जइ, पवणसत्ति तह एहु महेसरु । सट्ठिपलं दसइ ज णिमज्जइ, सो अत्ता णउ चित्तहसाअरु ॥ इति श्रीमदभिनवगुप्ताचार्यविरचिते तन्त्रसारे कालाध्वप्रकाशनं नाम षष्ठमाह्निकम् ॥६॥

अब बाह्यविधि का वर्णन है वही ( बाह्यविधि ) स्थान प्रकल्पन शब्द से उल्लिखित हुआ है । उसमें स्थान तीन प्रकार हैं—प्राणवायु, १ शरीर और बाहर की वस्तुयें । २ उसमें प्राण की विधि ( निम्न प्रकार हैं ) । सब प्रकार आगे आलो- चनीय अध्वाएँ प्राण में स्थित हैं ३—इस प्रकार कलना की जाती है । प्राण के क्रम तथा अक्रम ४ से जो कलना है वही काल है । यह काल परमेश्वर के स्वरूप का अन्तर्गत है । उसकी भासना देव परमेश्वर की काली नाम की शक्ति ५ से होती है । भिन्न बनाकर ( बाहर प्रस्फुट रूप से उनका आभासन क्रम और १. प्राणवायु का पहला रूप सामान्य स्पन्दात्मक है और उसका दूसरा रूप शरीर में प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान आदि विशेष वृत्तियों के रूप धारण कर स्थित है । २. शरीर के बाहर जिन वस्तुओं के सहारे लोग परमार्थ प्राप्ति के लिए प्रयत्न करते हैं वे ग्यारह प्रकार के हैं, जैसे मण्डल, स्थण्डिल, पात्र, अक्षसूत्र, पुस्तक, लिङ्ग, तूर, पट, पुस्त, प्रतिमा और मूर्ति । ३. सामान्य स्पन्दात्मक प्राण में ६ प्रकार की अध्वाएँ स्थित हैं । ४. भावों की कलना क्रम से तथा अक्रम से होती है । कलना के कारण ही वस्तुओं में परिच्छिन्नता आती है । इस प्रकार कलना करने वाला ही काली है । भावों का अवभास दो प्रकार से होता है—एक तो क्रम से, जैसे कार्य और कारणों का, और दूसरा चित्र सम्बन्धी ज्ञान अक्रम से होता है । जैसे एक ही चित्र में पूर्व काल में स्थित वस्तुएँ समान काल में स्थित वस्तुओं की अपेक्षा करती हुई बिना किसी क्रम से भासित होती हैं । ५. संवित् नित्य होने के कारण उसमें काल का सम्बन्ध कैसे हो सकता है हृदय में इस प्रकार आशय रखते हुए ग्रन्थकार ने कहा है कि प्रकाशरूप परमेश्वर ही अपनी इच्छा से प्रमातृ प्रमेयरूप जगत् की कलना करते हैं; उनकी कलना करने वाली शक्ति ही काली है । वस्तुतः उनमें कोई क्रम या अक्रम नहीं है ।

५६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ६ अक्रम रूप कलना ही प्राणरूप वृत्ति¹ है। संवित् ही प्रमेयों से पृथक रूप धारण करती है। इससे जो परिच्छिन्नता आती है इसके कारण आकाश (शून्य)² भी वेद्य रूप में परिणत होता है उसके अनन्तर अपनी स्वतंत्रता से प्रमेय विषयक स्थिति को फिर से अपनाने की उन्मुखता के कारण उच्छलित होकर वही संवित् बहिर्मुख हो जाती है। (इस स्थिति में) क्रियाशक्ति की प्रधानता आती है। उसका स्वरूप प्राणरूप³ जीव स्वभाव है। वही प्राण पाँच रूपों से क्योंकि शरीर को सम्पूर्णरूप से पूर्ण रखता है इसलिए शरीर चेतन सा प्रतीत होता है। उस क्रियाशक्ति के पहले भाग में काल रूप अध्वा, दूसरे भाग में मूर्ति वैचित्र्यरूप देशाध्वा की स्थितियाँ हैं।⁴ वर्ण, मन्त्र, पद रूप अध्वाओं की स्थिति कालाध्वा में है, क्योंकि ये पर, सूक्ष्म और स्थूल रूप १. कालशक्ति के योग से संवित् अपने के साथ अभिन्न रूप में जो स्थित है, उसे क्रम तथा अक्रम रूप कल्लना के द्वारा बाहर स्फुट रूप से अवभासित करती है और इसके फलस्वरूप वही प्राणना रूप वृत्ति का रूप धारण करती है। २. संवित् वास्तविकता से शुद्ध प्रकाश रूप है। उसी संवित् में प्रमातृ प्रमेय रूप विश्व अविभक्त अवस्था में स्थित रहता है। संवित् अपनी स्वतन्त्रता से विश्वरूप मेय को अपने स्वरूप से अलग कर देती है और 'मैं विश्वोत्तीर्ण हूँ' इस प्रकार आमर्शन करती है—यही संवित् की शून्यरूपता है। ३. पहले जो शून्य प्रमाता का उल्लेख किया गया है उसी का बहिर्मूख प्रसरण ही प्राण है। स्वविमर्श रूप जो ईषत् चलन है जिसे स्पन्दन कहते हैं, उसी का प्राथमिक प्रसरण ही प्राण का रूप धारण करता है। शून्यता के आभासन के अनन्तर संवित् प्राणरूप में स्फुरित होती है—इसलिए कहा गया है—'प्राक् संवित् प्राणे परिणता', संवित् ही प्राण है। प्राण उससे भिन्न कोई वस्तु विशेष नहीं है। ४. समग्र अध्वाओं को पहले दो भागों में देखे जाते हैं—एक है कालाध्वा और दूसरा देशाध्वा है, क्रिया के साथ जिस अध्वा का सम्बन्ध है उसे कालाध्वा कहते हैं, और विभिन्न प्रकार भाव या विषय जैसे घर, आँगन, देवालय आदि देशाध्वा के अन्तर्गत हैं। फिर काल तथा देश रूपो अध्वाओं के सूक्ष्म और स्थूल रूप हैं, जो तीन-तीन भागों में विभक्त हैं। दोनों अध्वाओं की कुल संख्या छः हैं।

आ. ६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ५७ हैं। देशाध्वा की स्थिति तत्त्व, भुवन और कला रूप में होती है— इसका विवरण आगे चलकर होगा। शरीर में यद्यपि प्राण बाहर और भीतर ओत प्रोत है तो भी स्फुट प्रयत्नजन्य प्राण का उदय हृदय से ही (होता है), इसलिए वही से उसका निरूपण होना चाहिए।¹ प्राण की क्रिया के विषय में ईश्वरीय शक्ति,² आत्मशक्ति और प्रयत्न इन तीनों को कारण के रूप में निर्देश किया जाता है—क्योंकि इन्हीं का गौणमुख्यभाव है।³ हृदय से द्वादशान्त के अन्त तक प्राण का चार (गति) सभी के अपने अंगुली के छत्तीस अंगुलियाँ हैं, यह चार निर्गम और प्रवेश दोनों समय, क्योंकि सभी को अपने के उपयोगी बल, यत्न और शरीर होता है। उस चार में घटिका, तिथि, मास, वर्ष और वर्ष समूहात्मक काल सन्निविष्ट हैं—इस प्रकार समग्र काल की परिसमाप्ति (चार में) होती है। १ १/५ अंगुली से एक चषक होता है—इस स्थिति के अनुसार घटिका का उदय होता है। साठ चषकों से घटिका होती है—इसलिए घटिका बहात्तर अंगुलियों से बनती हैं। अब (प्राण में) तिथि के उदय का क्रम है। २ २/५ अंगुलियों से एक त्रुटि बनती है—ऐसा कहा जाता है। वैसी ३. यद्यपि प्राण की गति स्वभाव से कन्द से ही आरम्भ होती है तो भी स्वाभाविक प्राणचार से कोई फल नहीं होता, इच्छा से प्राण को प्रेरित करने पर ही विभिन्न प्रकार की सिद्धियाँ होती हैं, इसलिए हृदय से प्राण की गति-सम्बन्धी उपदेश दिया गया है। १. ईश्वरीय शक्ति कहने का तात्पर्य यह है कि उनकी वामा, ज्येष्ठा और रौद्री नाम की जो शक्तियाँ हैं उनके किसी एक के द्वारा प्राण में प्रयत्न उत्पन्न होता है। प्रभु शक्ति, निजी आत्मा और प्राण इन तीनों के सम्मिलन से प्राणस्पन्द जग उठता है। वामा शक्ति जब प्राण में गति लाती है तब मनुष्य संसाराभिमुख रहता है, ज्येष्ठा शक्ति प्रबुद्धता और रौद्री शक्ति संसार में लोगों को रखकर शिवभाव लाती है। २. कभी प्रभुशक्ति प्राणस्पन्द में मुख्य है जैसे आँखों के स्फुरण में, वैसे आनन्दे- न्द्रिय के संकोच या विकास में आत्मशक्ति मुख्य है और हृदय में प्राण की स्वाभाविक गति के विषय में प्राण ही मुख्य है—लेकिन जहाँ जो मुख्य है वहाँ गौणरूप में अन्य दो का सम्बन्ध अवश्य रहता है।

५८ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ६ चार त्रुटियों से प्रहर बनता है ।¹ एक एक त्रुटि का आधा संध्या है। प्राण के निर्गमन ही दिन है, भीतर प्रवेश को रात्रि कहते हैं। यही हुआ तिथि का उदय । अब मास के उदय का क्रम है। ( इस मासक्रम में ) दिन कृष्णपक्ष² है और रात्रि शुक्लपक्ष है। उसमें पहली त्रुटि का आधा भाग और अन्तिम त्रुटि का आधा भाग विश्रान्ति रूप हैं इसलिए वे दो स्थान ( अर्थात् जहाँ इस अर्धत्रुटि का उदय और विश्राम होते हैं वे स्थान ) काल से सम्पर्क नहीं रखते³, बीच की पन्द्रह त्रुटियाँ तिथि रूप हैं। उनमें प्रकाश तथा विश्राम दोनों हैं इसलिए वे ( प्रकाश और विश्राम ) ही दिन तथा रात्रि हैं। फिर दिन वेद्यमयता का प्रकाशक है⁴ और रात्रि में वेद्यमयता का ह्रास होता है और जब विचार करनेवाले वेदक में उसका ( वेद्य का ) विलयन होता है तब वही रात्रि है। प्रकाश और विश्रान्ति कभी ह्रस्वकाल स्थायी और दीर्घकाल स्थायी होते हैं, इसलिए इनका भेद है—जब ये दोनों सम हो जाते हैं तब विषुवत्काल है। उस कृष्णपक्ष में प्राणरूपी सूर्य को अपानरूपी चन्द्र आप्यायन करनेवाली एक-एक कला ( प्रति तिथिक्रम से ) अर्पण करता है, जब पन्द्रहवीं त्रुटि में द्वादशान्त के निकट चन्द्रमा का कलाप्रसरण क्षीण हो जाता है तब ( अर्थात् चन्द्रमा ) प्राणरूपी सूर्य में लीन हो जाती है। इसके बाद जो अर्धत्रुटि है वह पक्ष की सन्धि है। उस अर्धत्रुटि का पूर्व अर्ध ( अर्थात् १. छत्तीस अँगुली विस्तृत प्राण में चार प्रहरों की कल्पना करने पर प्रत्येक नौ-नौ अँगुली से एक-एक प्रहर बनता है। प्रत्येक प्रहर में त्रुटियों की संख्या भी नौ है। एक त्रुटि का आधा भाग सन्ध्या मानी जाती है। २. दिन सूर्यरूपी है, उस समय अपानरूपी चन्द्र का क्षय हो जाता है इसलिए दिन कृष्णपक्ष है। उसी प्रकार रात्रि में अपानरूपी चन्द्र के उदय होने से रात्रि शुक्लपक्ष है। ३. हृदय और द्वादशान्त ये दो स्थान अर्धत्रुटियों के विश्रामभूमियाँ हैं इसलिए ये स्थान अकाल्य कलित हैं। ये विश्राम भूमियाँ प्राण और अपानों की सन्धि है जो अर्ध त्रुट्यात्मक है, दोनों की कुल संख्या एक त्रुटि है। ४. वेद्य विषयों का प्रकाश जिस समय होता है वह दिन है। उस समय वेद्य विषय ही मुख्य है, वेदक गौण है। जहाँ प्रकाश की प्रधानता है वह दिन है, विश्रान्ति या आनन्द प्रधान होने पर रात्रि है।

आ. ६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ५९ प्राण सम्बन्धी अर्धत्रुटि) आमावस्या है, दूसरी अर्धत्रुटि (अपान सम्बन्धी) प्रतिपत् का है। जब प्रतिपत् के उस भाग में कास प्रयत्न आदि के कारण आमावस्या का भाग प्रविष्ट हो जाता है तब तिथिच्छेद होता है और ग्रहण होता है। उस जगह वेद्यरूप सोम के साथ चलने- वाला मायाप्रमातारूपी राहु जो स्वभावतः उसे विलयन करने में असमर्थ है केवल आच्छादन ही कर सकता है, सूर्य में निहित चन्द्र सम्बन्धी अमृत का पान करता है। प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय इन तीनों का अविभक्त यह काल (अर्थात् ग्रहण काल) पावन है और पारलौकिक फल देनेवाला है। इसके अनन्तर चन्द्रमा के प्राण में प्रवेश होने पर चित्रूपी सूर्य एक एक कला से अपानरूपी चन्द्रको आपूरण करता है और पञ्चदशी त्रुटि से पूर्णिमा होती है—इसके बाद पक्षसन्धि और ग्रहण आदि पहले जैसे हैं—यह इहलोक के लिए फलदायी है—यही मासोदय है। अब वर्ष का उदय है। उसमें कृष्णपक्ष में ही उत्तरायण है। प्रति छः- छः अङ्गुलियों के अन्त में संक्रान्ति है जो मकर से आरम्भ होकर मिथुन के अन्त तक (व्याप्त) है। १ प्रत्येक अङ्गुलि में पाँच-पाँच तिथियाँ होती है, उसमें दिन तथा रात के विभाग (समझना चाहिए।) इस प्रकार प्रवेश में २ दक्षिणायन है—गर्भता, उद्भव की इच्छा किसी विषय सम्बन्धी सामान्यतः उद्भव की इच्छा, उद्भवन के लिए उच्छलन, उद्भव का आरम्भ, उद्भव, जन्म, सत्ता, परिणति, वृद्धि, ह्रास और क्षय ये अन्तिम छः मकर से लेकर द्वादश राशियों के फल हैं। ३ उपासना का भी उसी १. छत्तीस अंगुलि विस्तृत प्राण को छः-छः अँगुलियों में विभाजित करने पर प्रत्येक छः अँगुलि के अन्त में एक-एक संक्रान्ति होती है। मकर, कुम्भ, मीन, मेष, वृष, मिथुन इन राशियों के प्रत्येक के अन्त में एक-एक संक्रान्ति है। राशि के समान प्रत्येक अँगुलि में पाँच-पाँच तिथियों की भी कल्पना होती है। २. शक्ति स्थान से हृदय की ओर प्रवेश में। ३. बाहर राशियों में मकर से मीन तक उत्तरायण है, उसी प्रकार कर्क से धनु तक दक्षिणायन है। उत्तरायण काल पारलौकिक कार्यों में और दक्षिणायन काल इहलौकिक कार्यों में सिद्धियाँ लाते हैं। मकर से लेकर मिथुन तक छः तथा कर्क से धनु तक छः राशियों में गर्भता से लेकर क्षय तक बारह स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं। अतः जब जिस राशि का उदय

६० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ६ -

प्रकार समुचित फल देता है। ये दक्ष से लेकर पितामह तक रुद्र१ और उनकी शक्तियाँ बारह महीनों के अधिपति हैं। यही वर्षोदय है। प्रत्येक अंगुली में ६० तिथियाँ हैं ऐसा मानने से संक्रान्ति में ही वर्ष बनता है,—इस क्रम के अनुसार प्राण के प्रवेश और निर्गमन से बारह वर्षों का उदय समझना चाहिए।२ प्रत्येक अंगुलि में तिथियों की संख्या तीन सौ मान ली जाय तो एक अंगुलि के पाँचवे भाग में वर्ष होता है। पहले चषक का जो उल्लेख हुआ है इस प्रकार गणना से एक संक्रान्ति में पाँच वर्ष होते हैं। इस पद्धति से एक ही प्राण के प्रवेश तथा निर्गमन काल में साठ वर्ष के उदय होते हैं, जिसमें इक्कीस हजार छः सौ तिथियों की संख्या होती है। दिन और रात में उतनी ही प्राण की संख्या है, अतः साठ वर्षों के उदय से अधिक की परीक्षा नहीं की जाती है क्योंकि उससे अनन्त कल्पना का अवसर आ जाता है। इस विषय में मनुष्य का वर्ष३ ही देवताओं की तिथि है। इस हिसाब से दिव्य द्वादश सहस्र वर्ष मिलकर चार युग बनते हैं।४ चार, तीन, दो


होता है, उस समय गर्भता आदि बारह स्थितियाँ आती हैं, जिसके अनुसार जपादि का फल भी उसी प्रकार समझना चाहिए। १. रुद्रों के नाम निम्न प्रकार हैं—दक्ष, चण्ड, हर, शौण्डी, प्रमथ, भीम, मन्मथ, शकुनि, सुमति, नन्द, गोपालक और पितामह। २. प्रति अंगुलि में ऋतु, तीन-तीन अँगुलियों से अयन और छः अँगुलियों से वर्ष—इस रीति से गणना करने पर प्राण के एक-चार से छः वर्ष और अपान के एक-चार से छः वर्षों के उदय होते हैं, इसलिए दोनों मिलकर बारह वर्षों का उदय करवाते हैं। ३. मनुष्य का लौकिक वर्ष, प्राणीय वर्ष उससे भिन्न है। ४. बारह हजार दिव्य वर्ष का मान इस प्रकार है—कृत—४००० वर्ष, त्रेता—३००० वर्ष, द्वापर—२००० वर्ष, कलि—१००० वर्ष, कुल दस हजार वर्ष हैं। शेष दो हजार वर्ष सन्ध्या का मान है, जो ४००, ३००, २०० और १०० वर्ष हैं। कलि के अन्तिम १०० वर्ष और कृत युग के अग्रिम ४०० वर्ष मिलकर ५०० वर्ष प्रथम सन्ध्या है, इसी प्रकार सत्य और त्रेता की सन्ध्या ४०० + ३०० = ७०० वर्ष, त्रेता तथा द्वापर की सन्ध्या ३०० + २०० = ५०० वर्ष, द्वापर तथा कलि की सन्ध्या २०० + १०० = ३०० वर्ष है। इस प्रकार कुल सन्ध्यामान २००० वर्ष हैं।