भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

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६० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ६ -

प्रकार समुचित फल देता है। ये दक्ष से लेकर पितामह तक रुद्र१ और उनकी शक्तियाँ बारह महीनों के अधिपति हैं। यही वर्षोदय है। प्रत्येक अंगुली में ६० तिथियाँ हैं ऐसा मानने से संक्रान्ति में ही वर्ष बनता है,—इस क्रम के अनुसार प्राण के प्रवेश और निर्गमन से बारह वर्षों का उदय समझना चाहिए।२ प्रत्येक अंगुलि में तिथियों की संख्या तीन सौ मान ली जाय तो एक अंगुलि के पाँचवे भाग में वर्ष होता है। पहले चषक का जो उल्लेख हुआ है इस प्रकार गणना से एक संक्रान्ति में पाँच वर्ष होते हैं। इस पद्धति से एक ही प्राण के प्रवेश तथा निर्गमन काल में साठ वर्ष के उदय होते हैं, जिसमें इक्कीस हजार छः सौ तिथियों की संख्या होती है। दिन और रात में उतनी ही प्राण की संख्या है, अतः साठ वर्षों के उदय से अधिक की परीक्षा नहीं की जाती है क्योंकि उससे अनन्त कल्पना का अवसर आ जाता है। इस विषय में मनुष्य का वर्ष३ ही देवताओं की तिथि है। इस हिसाब से दिव्य द्वादश सहस्र वर्ष मिलकर चार युग बनते हैं।४ चार, तीन, दो


होता है, उस समय गर्भता आदि बारह स्थितियाँ आती हैं, जिसके अनुसार जपादि का फल भी उसी प्रकार समझना चाहिए। १. रुद्रों के नाम निम्न प्रकार हैं—दक्ष, चण्ड, हर, शौण्डी, प्रमथ, भीम, मन्मथ, शकुनि, सुमति, नन्द, गोपालक और पितामह। २. प्रति अंगुलि में ऋतु, तीन-तीन अँगुलियों से अयन और छः अँगुलियों से वर्ष—इस रीति से गणना करने पर प्राण के एक-चार से छः वर्ष और अपान के एक-चार से छः वर्षों के उदय होते हैं, इसलिए दोनों मिलकर बारह वर्षों का उदय करवाते हैं। ३. मनुष्य का लौकिक वर्ष, प्राणीय वर्ष उससे भिन्न है। ४. बारह हजार दिव्य वर्ष का मान इस प्रकार है—कृत—४००० वर्ष, त्रेता—३००० वर्ष, द्वापर—२००० वर्ष, कलि—१००० वर्ष, कुल दस हजार वर्ष हैं। शेष दो हजार वर्ष सन्ध्या का मान है, जो ४००, ३००, २०० और १०० वर्ष हैं। कलि के अन्तिम १०० वर्ष और कृत युग के अग्रिम ४०० वर्ष मिलकर ५०० वर्ष प्रथम सन्ध्या है, इसी प्रकार सत्य और त्रेता की सन्ध्या ४०० + ३०० = ७०० वर्ष, त्रेता तथा द्वापर की सन्ध्या ३०० + २०० = ५०० वर्ष, द्वापर तथा कलि की सन्ध्या २०० + १०० = ३०० वर्ष है। इस प्रकार कुल सन्ध्यामान २००० वर्ष हैं।

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