भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

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आ. ६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ६१ और एक सत्ययुग से कलियुग तक उतनी ही सौ संख्याओं से आठ सन्ध्याएँ होती हैं। एकहत्तर चार युगों से एक मन्वन्तर होता है, चौदह मन्वन्तर से ब्रह्मा का एक दिन है।¹ ब्रह्मा के दिन के अन्त होने पर² त्रिलोक³ कालाग्निज्वाला से दग्ध हो जाता है और अन्य लोकत्रय भी भी धूम से प्रस्वापित हो जाते हैं। जिसमें निवास करनेवाले जीव आदि तीव्र अग्नि ज्वाला से प्रेरित होकर प्रलयाकल जीव के रूप में जनलोक में अवस्थान करते हैं। लेकिन कूष्माण्ड हाटक आदि जो प्रबुद्ध जीव हैं वे महर्लोक में खेलते रहते हैं। रात्रि के अवसान होने पर ब्राह्मी सृष्टि का प्रारम्भ होता है। इसी मान से शतवर्ष ब्रह्मा की आयु है। (ब्रह्मा का स्थितिकाल) विष्णु का दिन है, उतनी ही रात है, उनकी भी आयु शतवर्ष है। उनकी आयु रुद्रलोक के स्वामी रुद्र का दिन है, उतनी ही रात है—पहले जैसे वर्ष भी है। सौ वर्ष ही उसकी अवधि है। रुद्र के अधिकार की समाप्ति होने पर उनकी शिवत्वगति होती है। रुद्र के अधिकार का काल ब्रह्माण्डधारक शतरुद्र का दिन है—रात्रि भी उतनी है—उनकी भी आयु शत वर्ष हैं। शतरुद्रों के विनाश होने पर ब्रह्माण्ड का नाश होता है। इस प्रकार जलतत्त्व से लेकर अव्यक्त तक तत्त्वों में स्थित रुद्रों के इसी क्रम से आयु का मान है। जो पहले वाले की आयु है वही आगे आनेवाले का दिन है। उसके बाद ब्रह्मा³ और रुद्र जो जल तत्त्व आदि के अधिकारी हैं अव्यक्त तत्त्व में वर्तमान रहते १. प्रति मन्वन्तर में एक-एक इन्द्र का स्थितिकाल है, इसलिए १४ मन्वन्तर में १४ इन्द्र राज्य करने के बाद प्रस्थान करते हैं। २. त्रिलोक शब्द से निरय से लेकर भू, भुव और स्वर्ग समझना है। ३. यहाँ जो ब्रह्मा का उल्लेख हुआ है वह बुद्धि तत्त्व में जो ब्रह्मा स्थित हैं उन्हीं को समझना है, सत्यलोक स्थित ब्रह्मा को नहीं। गुणतत्त्व में जो शतरुद्र रहते हैं उनके दिनान्त होने पर बुद्धितत्त्व में स्थित ब्रह्मा का संहार होता है। रुद्र के दिन के आरम्भ होने पर ब्रह्मा की सृष्टि होती है। रुद्र के एक वर्ष में ३६० ब्रह्माओं की उत्पत्ति और संहार हो जाते हैं। अतः रुद्र की सौ वर्ष की आयु में ३६० × १०० = ३६०० हजार ब्रह्माओं की उत्पत्ति और विलयन होते हैं। गुणतत्त्वनिवासी रुद्रों के सौ वर्ष अव्यक्त निवासी रुद्र के एक दिन के बराबर हैं।