तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ६ हैं।१ श्रीकण्ठनाथ उस समय के संहार करनेवाले हैं। यह अवान्तर प्रलय२ हैं, इसके अवसान होने पर पुन: सृष्टि होती है।३ उस समय अन्य शास्त्रों के द्वारा जो मुक्त माने जाते हैं उनकी भी सृष्टि होती है। श्रीकण्ठनाथ के जो आयु का काल है वही कंचुकवासी रुद्रों का दिन है।४ रात्रि का मान भी उतना ही है। उनका जो आयुष्काल है वही गहनेश का दिन है—रात्रि भी उसी मान का है। उस रात्रि में सभी वस्तुएँ माया में विलीन हो जाती हैं। फिर गहनेश सृष्टि कार्य करते हैं। इस प्रकार जो अव्यक्तसम्बन्धी काल है उसे दस परार्ध से गुणा करने पर काल का जो मान आता है वही माया का दिन है, रात भी उतनी है। वही प्रलय है। माया का काल सौ परार्ध से गुणा करने पर जो काल का मान है वही ईश्वर तत्त्व में दिन है। इस समय प्राण ही जगत् की सृष्टि करता है, रात भी उतनी है। जिस समय प्राण का प्रशमन हो जाता है अर्थात् जिस समय ब्रह्मबिलरूपी धाम में प्राण के प्रशमन होने पर जो संवित् शेष रहती है उसमें भी क्रम है। ईश्वरीय काल को सौ परार्ध से गुणा करने पर जो संख्या आती है सदाशिव सम्बन्धी दिन वही है; रात्रि २. ब्रह्माण्ड के नाश होने पर ब्रह्मादि अधिकारी पुरुष अव्यक्त अर्थात् मूल प्रकृति में श्रीकण्ठ के साथ रहते हैं। उनमें परशक्तिपात न होने के कारण उनकी स्थिति भोगहीन रहती है—बुद्धि से निम्नभूमि में उनकी गति नहीं होती—क्योंकि उनके कर्म की निवृत्ति हो चुकी है, अगर उनमें किसी में परशक्तिपात हो जाता है तो आत्मतत्त्व का साक्षात्कार हो जाने के कारण उनकी अधिकार निवृत्ति हो जाती है और शिवत्व लाभ हो जाता है। ३. अव्यक्त की रात्रि ही अवान्तर प्रलय है। ४. आगम के मतानुसार सांख्य आदि विज्ञान से जिन लोगों ने सिद्धि प्राप्त की है, उनका परममोक्ष न होने के कारण नवीन सृष्टि के प्रारम्भ के साथ उन्हें जन्म लेना पड़ता है। ५. आगम के अनुसार कंचुक पाँच या छः हैं जो नियति, काल, राग, विद्या, कला और माया हैं। माया सर्वव्यापक है इसलिए सर्वनिम्न नियति का सौ वर्ष काल का एक दिन है, कालतत्त्व के निवासियों के सौ वर्ष रागतत्त्व में निवासियों का एक दिन है, रागतत्त्व के सौ वर्ष विद्यातत्त्व का एक दिन है, विद्यातत्त्व के सौ वर्ष कलातत्त्व का एक दिन है उसी प्रकार कलातत्त्व के सौ वर्ष मायातत्त्व का एक दिन है।