भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

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आ. ६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ६३ का परिमाण भी उतना है—वही महाप्रलय है।१ सदाशिवजी अपने काल की समाप्ति होने पर बिन्दु, अर्धचन्द्र तथा निरोधिका का अतिक्रमण करते हुए नाद में विलीन हो जाते हैं। नाद शक्तितत्त्व में, शक्तितत्त्व व्यापिनी में, व्यापिनी अनाश्रित में (लीन होते हैं) शक्ति के काल परार्धकोटि से गुणा करने पर जो परिमाण है अनाश्रित शिव का वही दिन है। अनाश्रित सामनस पद में लीन होता है। समना सम्बन्धी जो साम्य है वही ब्रह्म है। यह जो सामनस्य है उसका कलन नहीं हो सकता, लेकिन (उस साम्यरूपी) काल से निमेष और उन्मेष रूप में ही पहले उल्लिखित अशेष काल का उदय विलयनरूपी चक्र का भ्रमण चलता रहता है। अब संख्याओं के क्रम दिखलाया जाता है जैसे एक, दश, शत, सहस्र, अयुत, लाख, नियुत, कोटि, अर्बुद, वृन्द, खर्व, निखर्व, पद्म, शंकु, समुद्र, अन्त्य, मध्य, परार्ध—इस क्रम से दस से गुणन के द्वारा अठारह स्थान आते हैं—यह गणित की विधि है। इस प्रकार असंख्य प्रकार के सृष्टि और प्रलय एक महासृष्टि रूपी प्राण में स्थित हैं। प्राण की स्थिति संवित् में, फिर वह उपाधि में, उपाधि चिन्मात्रा में, जो कालोदय नाम से परिचित है वह चिन्मात्रा का ही स्पन्द है। उसी से (स्पन्द से) स्वप्न और संकल्प आदि में जो विचित्रता दिखाई पड़ती है उससे उसमें कोई विरोध नहीं आता है। जैसे प्राण में काल का उदय होता है उसी प्रकार अपान में भी उसका उदय हृदय से मूलपीठ (मूलाधार) तक (होता है)।२ जैसे हृदय, कण्ठ, तालु, ललाट, ब्रह्मरन्ध्र और द्वादशान्त३ आदि स्थानों में ब्रह्मा, १. सदाशिव की जो रात्रि है वही वास्तविक महाप्रलय है, उस समय शुद्ध अवस्थाएँ भी साम्य स्थिति में विलीन हो जाती हैं। समना में काल का मान नहीं होता—यह नित्योदित परमास्थिति है। यद्यपि सभी अणु समना में स्थित हो जाते हैं, फिर भी उनको शिवत्व लाभ नहीं होता, क्योंकि समना तक पाशजाल विस्तृत है। यह याद रखने योग्य है कि इस साम्यरूपी काल से निमेष उन्मेष के क्रम से त्रुटि से परार्ध पर्यन्त प्रसर होता है। २. संवित्-स्पन्द के कारण एक ही सूक्ष्मक्षण विचित्र तथा दीर्घकाल के अनुभव के रूप में अनुभव होता है—परिमित काल विस्तृत हो जाता है। ३. द्वादशान्त दो माने जाते हैं—एक ब्रह्मरन्ध्र के ऊपर स्थित है और दूसरा मूलाधार में। पहले का नाम शिव द्वादशान्त और दूसरे का नाम शक्ति-