तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ६ विष्णु, रुद्र, ईश्वर, सदाशिव और अनाश्रित नामक शिव प्रभृति कारण- षट्क¹ स्थित हैं उसी प्रकार अपान में भी हृदय, कन्द, आनन्द, संकोच, विकास और द्वादशान्त प्रभृति स्थानों में बाल्य, यौवन, वार्धक्य, मृत्यु, जन्मान्तर और मुक्ति के अधिपति के रूप² में ये स्थित हैं। अब समान में कालोदय (की बातें हैं) समानरूपी वायु हृदय³ में उत्पन्न दसों नाड़ियों⁴ में संचरण करता हुआ सम्पूर्ण शरीर में समरूप से रस आदि को पहुँचाता है। वहाँ आठों दिशाओं में घूमता हुआ विभिन्न दिशाओं के जो जो अधिपति हैं⁵ उनके कार्यों का प्रमातृरूपी जीवों द्वारा अनुकरण करवाता है। वह ऊर्ध्व तथा अधः विचरण करता हुआ तीन नाड़ियों⁶ से यातायात करता है। विषुवत् दिन के बाहरी प्रभातकाल में १ ३/४ घटिका काल तक सुषुम्ना मार्ग से बहता है। उसके बाद नौ सौ प्राणों की गतियों से बने २ १/२ घण्टे तक वह वायु वाम में, दक्षिण में, वाम में, दक्षिण में और वाम में इस प्रकार पाँच संक्रान्तियाँ उत्पन्न करता है। इस प्रकार पाँच संक्रान्तियाँ की समाप्ति होने पर और १३ १/२ घण्टे बीत जाने पर दक्षिण में शारदीय विषुवत् होता है जिसकी अवधि द्वादशान्त है। इसी दूसरे स्थान से ही शक्ति के उदय तथा विश्राम होते हैं। १. कारणषट्क जैसे आरोहक्रम में हृदय, कण्ठ आदि स्थानों में स्थिति हैं, उसी प्रकार अवरोह क्रम में उनके स्थान हृदय, कन्द आदि हैं। २. कामिक आगम के अनुसार ब्रह्मादि कारणषट्क जीवों के जन्म से मुक्ति तक विभिन्न स्थितियों के अधिपति माने जाते हैं। ३. यद्यपि नाड़ियों की उत्पत्ति नाभि से है तो भी हृदय ही नाड़ियों की अभि- व्यक्ति स्थान है। ४. इड़ा, पिङ्गला, सुषुम्ना, गान्धारी, हस्तिजिह्वा, यशा, अलम्बुसा, कुहू, शङ्खिनी ये दस नाड़ियाँ हैं। ५. दिशाओं के अधिपति इन्द्र, अग्नि, यम आदि हैं। विभिन्न स्थितियों के अनुसार कभी साम्य कभी क्रूर कार्य आदि करवाते हैं। इनकी स्थिति के कारण मनुष्य कभी दुःखी कभी क्रोधी बन जाते हैं। ६. तीन मुख्य नाड़ियाँ इड़ा, पिङ्गला तथा सुषुम्ना हैं। इड़ा का स्थान वाम में, पिङ्गला दक्षिण में और सुषुम्ना की स्थिति मध्य में है। इड़ा चन्द्ररूपी, पिङ्गला सूर्यरूपी और सुषुम्ना अग्निरूपी है।