तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआ. ६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ६५ प्राणों के नौ सौ चार हैं। वहाँ से भी दक्षिण में, वाम में, दक्षिण में, वाम में, दक्षिण में पाँच संक्रान्तियाँ होती हैं। इनके प्रत्येक में नौ सौ प्राणों के चार होते हैं ! इस प्रकार प्रत्येक के लिए नौ सौ प्राणचार अपेक्षित है—इस प्रकार रात में भी होते हैं। इस प्रकार विषुवत् दिन तथा रात में बारह बारह संक्रान्तियाँ होती हैं। दिन की वृद्धि और क्षय होने पर संक्रान्ति की वृद्धि और क्षय होते हैं। इस प्रकार एक ही समान वायु में दो वर्ष होते हैं क्योंकि इसमें श्वास और प्रश्वास के योग का अभाव है। इसमें भी बारह वर्षों का उदय पहले जैसा है। उदान का चार या गति द्वादशान्त तक है—क्योंकि यहाँ काल स्पन्दरूपी है। इसमें भी पहले जैसी विधि है। १ व्यान व्यापकरूप है और वह क्रमविहीन है तो भी उसमें सूक्ष्म उच्छलता के योग से काल का उदय होता है। अब वर्णोदय की बातें हैं। इसमें प्रति अर्धप्रहर में वर्ग२ के उदय होते हैं। विषुवत् काल में ये ( उदय ) बराबर होते हैं। प्रति वर्ण३ के लिए दो सौ सोलह प्राणों की आवश्यकता होती है। बाहर ३६ चषक इस उदय का स्थान वै। यह जो वर्णोदय की बात है वह अयत्नज४ है, लेकिन प्रयत्नजनित मन्त्रोदय अरघट्ट-घटीयन्त्र के संचालन करते समय एक ही अनुसन्धि के बल से विचित्र मन्त्रों के उदय करते हुए योगी मन्त्रदेवता के साथ तदात्मता प्राप्त करते हैं। उसमें नित्योदित प्राणचार५ की संख्या से ही उनकी उदयसंख्या की व्याख्या हो जाती है। मन्त्र ( अवयव ) संख्या दो गुणा होने पर उदय संख्या आधी होती है। इस क्रम से १०८ संख्या वाले चक्र हो तो उसके उदय दो सौ हैं। इस क्रम १. प्राण में जैसे त्रुटि से साठ वर्षों की कल्पना की जाती है उसी प्रकार इसमें भी ऐसी कल्पना होती है। २. वर्ग आठ हैं—जैसे अ वर्ग, क वर्ग, च वर्ग, ट वर्ग, त वर्ग, प वर्ग, य वर्ग और श वर्ग। ३. वर्णों की संख्या पचास है इसलिए दिन में १०८०० प्राणों के चारों से २५ वर्णों के और रात में उसी संख्या के प्राणों के चारों से शेष २५ वर्णों के उदय होते हैं। ४. जो वर्ण स्वभावतः प्राण चार के सहगामी है वही यत्नज वर्ण का उदय है। ५. नित्योदित प्राणचारों की संख्या २१६०० है। ५