तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
पृष्ठ 147, कुल 294 में से
संदर्भ में पढ़ें६६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ६ से स्थूल से सूक्ष्म चार स्वरूप में विश्रान्त होने वाले योगी का प्राणचार क्षीण हो जाता है और इसके फलस्वरूप काल का ग्रसन हो जाता है। उस समय उसके निकट एक ही परिपूर्ण संवित्ति जो विचित्र शक्तिरूपिणी है भासने लगती है। काल की भिन्नता के कारण ही अनुभव की भिन्नता आती है, वेद्य के भेद के कारण नहीं, यह पर्वतशिखर में स्थित पुरुष के ज्ञान के सदृश है। ज्ञान का जो स्थितिकाल है वही क्षण है, एक प्राण के उदय में एक ही ज्ञान है। यह वास्तविक भी है, नहीं तो कोई भी विकल्पज्ञान एक नहीं होता, शब्द की मात्रा भी क्रमिक शब्दों से संश्लिष्ट होने के कारण क्रमिक है। जैसे किसी ने कहा है—'उसके आदि से उदात्त है जो अर्धह्रस्व है' काशिका १।२।३२ इसलिए जब तक अन्य स्पन्द का उदय नहीं होता है तब ज्ञान एक ही है। इसलिए इक्यासी पदों¹ के स्मरण के समय नाना प्रकार के धर्म के अनुप्रवेश के द्वारा एक ही परमेश्वर विषयक विकल्प जो काल के ग्रास होने पर अविकल्पस्वरूप धारण कर लेता है। इस प्रकार अखिल कालरूपी अध्वा को प्राण के उदय में देख सकने पर असंख्य और विचित्र सृष्टि और संहारों को उसीमें ( प्राण में ) आकलन करता हुआ ( योगी ) यह अपना ही परम ऐश्वर्य है ऐसे प्रत्यभिज्ञा से समझ कर मुक्त हो जाता है। × × × संविद्रूप निज स्वरूप की प्राणशक्तिमें कालातीत रूप को देखता हुआ योगी-सृष्टि, स्थिति और संहार चक्रों से सतत उद्योगी रहकर भैरव भाव प्राप्त करता है। × × × इति तन्त्रसार का षष्ठम् आह्निक।
१. क आदि वर्णों के ३३ अर्धमात्राएँ, ह्रस्व वर्णों के दस, दीर्घ वर्णों के ३२, प्लुत वर्णों के ६ अर्धमात्राएँ होती हैं। इनकी समष्टि ८१ हैं।