तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआ. ६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ५९ प्राण सम्बन्धी अर्धत्रुटि) आमावस्या है, दूसरी अर्धत्रुटि (अपान सम्बन्धी) प्रतिपत् का है। जब प्रतिपत् के उस भाग में कास प्रयत्न आदि के कारण आमावस्या का भाग प्रविष्ट हो जाता है तब तिथिच्छेद होता है और ग्रहण होता है। उस जगह वेद्यरूप सोम के साथ चलने- वाला मायाप्रमातारूपी राहु जो स्वभावतः उसे विलयन करने में असमर्थ है केवल आच्छादन ही कर सकता है, सूर्य में निहित चन्द्र सम्बन्धी अमृत का पान करता है। प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय इन तीनों का अविभक्त यह काल (अर्थात् ग्रहण काल) पावन है और पारलौकिक फल देनेवाला है। इसके अनन्तर चन्द्रमा के प्राण में प्रवेश होने पर चित्रूपी सूर्य एक एक कला से अपानरूपी चन्द्रको आपूरण करता है और पञ्चदशी त्रुटि से पूर्णिमा होती है—इसके बाद पक्षसन्धि और ग्रहण आदि पहले जैसे हैं—यह इहलोक के लिए फलदायी है—यही मासोदय है। अब वर्ष का उदय है। उसमें कृष्णपक्ष में ही उत्तरायण है। प्रति छः- छः अङ्गुलियों के अन्त में संक्रान्ति है जो मकर से आरम्भ होकर मिथुन के अन्त तक (व्याप्त) है। १ प्रत्येक अङ्गुलि में पाँच-पाँच तिथियाँ होती है, उसमें दिन तथा रात के विभाग (समझना चाहिए।) इस प्रकार प्रवेश में २ दक्षिणायन है—गर्भता, उद्भव की इच्छा किसी विषय सम्बन्धी सामान्यतः उद्भव की इच्छा, उद्भवन के लिए उच्छलन, उद्भव का आरम्भ, उद्भव, जन्म, सत्ता, परिणति, वृद्धि, ह्रास और क्षय ये अन्तिम छः मकर से लेकर द्वादश राशियों के फल हैं। ३ उपासना का भी उसी १. छत्तीस अंगुलि विस्तृत प्राण को छः-छः अँगुलियों में विभाजित करने पर प्रत्येक छः अँगुलि के अन्त में एक-एक संक्रान्ति होती है। मकर, कुम्भ, मीन, मेष, वृष, मिथुन इन राशियों के प्रत्येक के अन्त में एक-एक संक्रान्ति है। राशि के समान प्रत्येक अँगुलि में पाँच-पाँच तिथियों की भी कल्पना होती है। २. शक्ति स्थान से हृदय की ओर प्रवेश में। ३. बाहर राशियों में मकर से मीन तक उत्तरायण है, उसी प्रकार कर्क से धनु तक दक्षिणायन है। उत्तरायण काल पारलौकिक कार्यों में और दक्षिणायन काल इहलौकिक कार्यों में सिद्धियाँ लाते हैं। मकर से लेकर मिथुन तक छः तथा कर्क से धनु तक छः राशियों में गर्भता से लेकर क्षय तक बारह स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं। अतः जब जिस राशि का उदय