भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

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५८ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ६ चार त्रुटियों से प्रहर बनता है ।¹ एक एक त्रुटि का आधा संध्या है। प्राण के निर्गमन ही दिन है, भीतर प्रवेश को रात्रि कहते हैं। यही हुआ तिथि का उदय । अब मास के उदय का क्रम है। ( इस मासक्रम में ) दिन कृष्णपक्ष² है और रात्रि शुक्लपक्ष है। उसमें पहली त्रुटि का आधा भाग और अन्तिम त्रुटि का आधा भाग विश्रान्ति रूप हैं इसलिए वे दो स्थान ( अर्थात् जहाँ इस अर्धत्रुटि का उदय और विश्राम होते हैं वे स्थान ) काल से सम्पर्क नहीं रखते³, बीच की पन्द्रह त्रुटियाँ तिथि रूप हैं। उनमें प्रकाश तथा विश्राम दोनों हैं इसलिए वे ( प्रकाश और विश्राम ) ही दिन तथा रात्रि हैं। फिर दिन वेद्यमयता का प्रकाशक है⁴ और रात्रि में वेद्यमयता का ह्रास होता है और जब विचार करनेवाले वेदक में उसका ( वेद्य का ) विलयन होता है तब वही रात्रि है। प्रकाश और विश्रान्ति कभी ह्रस्वकाल स्थायी और दीर्घकाल स्थायी होते हैं, इसलिए इनका भेद है—जब ये दोनों सम हो जाते हैं तब विषुवत्काल है। उस कृष्णपक्ष में प्राणरूपी सूर्य को अपानरूपी चन्द्र आप्यायन करनेवाली एक-एक कला ( प्रति तिथिक्रम से ) अर्पण करता है, जब पन्द्रहवीं त्रुटि में द्वादशान्त के निकट चन्द्रमा का कलाप्रसरण क्षीण हो जाता है तब ( अर्थात् चन्द्रमा ) प्राणरूपी सूर्य में लीन हो जाती है। इसके बाद जो अर्धत्रुटि है वह पक्ष की सन्धि है। उस अर्धत्रुटि का पूर्व अर्ध ( अर्थात् १. छत्तीस अँगुली विस्तृत प्राण में चार प्रहरों की कल्पना करने पर प्रत्येक नौ-नौ अँगुली से एक-एक प्रहर बनता है। प्रत्येक प्रहर में त्रुटियों की संख्या भी नौ है। एक त्रुटि का आधा भाग सन्ध्या मानी जाती है। २. दिन सूर्यरूपी है, उस समय अपानरूपी चन्द्र का क्षय हो जाता है इसलिए दिन कृष्णपक्ष है। उसी प्रकार रात्रि में अपानरूपी चन्द्र के उदय होने से रात्रि शुक्लपक्ष है। ३. हृदय और द्वादशान्त ये दो स्थान अर्धत्रुटियों के विश्रामभूमियाँ हैं इसलिए ये स्थान अकाल्य कलित हैं। ये विश्राम भूमियाँ प्राण और अपानों की सन्धि है जो अर्ध त्रुट्यात्मक है, दोनों की कुल संख्या एक त्रुटि है। ४. वेद्य विषयों का प्रकाश जिस समय होता है वह दिन है। उस समय वेद्य विषय ही मुख्य है, वेदक गौण है। जहाँ प्रकाश की प्रधानता है वह दिन है, विश्रान्ति या आनन्द प्रधान होने पर रात्रि है।