भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

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पृष्ठ 138

आ. ६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ५७ हैं। देशाध्वा की स्थिति तत्त्व, भुवन और कला रूप में होती है— इसका विवरण आगे चलकर होगा। शरीर में यद्यपि प्राण बाहर और भीतर ओत प्रोत है तो भी स्फुट प्रयत्नजन्य प्राण का उदय हृदय से ही (होता है), इसलिए वही से उसका निरूपण होना चाहिए।¹ प्राण की क्रिया के विषय में ईश्वरीय शक्ति,² आत्मशक्ति और प्रयत्न इन तीनों को कारण के रूप में निर्देश किया जाता है—क्योंकि इन्हीं का गौणमुख्यभाव है।³ हृदय से द्वादशान्त के अन्त तक प्राण का चार (गति) सभी के अपने अंगुली के छत्तीस अंगुलियाँ हैं, यह चार निर्गम और प्रवेश दोनों समय, क्योंकि सभी को अपने के उपयोगी बल, यत्न और शरीर होता है। उस चार में घटिका, तिथि, मास, वर्ष और वर्ष समूहात्मक काल सन्निविष्ट हैं—इस प्रकार समग्र काल की परिसमाप्ति (चार में) होती है। १ १/५ अंगुली से एक चषक होता है—इस स्थिति के अनुसार घटिका का उदय होता है। साठ चषकों से घटिका होती है—इसलिए घटिका बहात्तर अंगुलियों से बनती हैं। अब (प्राण में) तिथि के उदय का क्रम है। २ २/५ अंगुलियों से एक त्रुटि बनती है—ऐसा कहा जाता है। वैसी ३. यद्यपि प्राण की गति स्वभाव से कन्द से ही आरम्भ होती है तो भी स्वाभाविक प्राणचार से कोई फल नहीं होता, इच्छा से प्राण को प्रेरित करने पर ही विभिन्न प्रकार की सिद्धियाँ होती हैं, इसलिए हृदय से प्राण की गति-सम्बन्धी उपदेश दिया गया है। १. ईश्वरीय शक्ति कहने का तात्पर्य यह है कि उनकी वामा, ज्येष्ठा और रौद्री नाम की जो शक्तियाँ हैं उनके किसी एक के द्वारा प्राण में प्रयत्न उत्पन्न होता है। प्रभु शक्ति, निजी आत्मा और प्राण इन तीनों के सम्मिलन से प्राणस्पन्द जग उठता है। वामा शक्ति जब प्राण में गति लाती है तब मनुष्य संसाराभिमुख रहता है, ज्येष्ठा शक्ति प्रबुद्धता और रौद्री शक्ति संसार में लोगों को रखकर शिवभाव लाती है। २. कभी प्रभुशक्ति प्राणस्पन्द में मुख्य है जैसे आँखों के स्फुरण में, वैसे आनन्दे- न्द्रिय के संकोच या विकास में आत्मशक्ति मुख्य है और हृदय में प्राण की स्वाभाविक गति के विषय में प्राण ही मुख्य है—लेकिन जहाँ जो मुख्य है वहाँ गौणरूप में अन्य दो का सम्बन्ध अवश्य रहता है।