भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

पृष्ठ 137, कुल 294 में से

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पृष्ठ 137

५६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ६ अक्रम रूप कलना ही प्राणरूप वृत्ति¹ है। संवित् ही प्रमेयों से पृथक रूप धारण करती है। इससे जो परिच्छिन्नता आती है इसके कारण आकाश (शून्य)² भी वेद्य रूप में परिणत होता है उसके अनन्तर अपनी स्वतंत्रता से प्रमेय विषयक स्थिति को फिर से अपनाने की उन्मुखता के कारण उच्छलित होकर वही संवित् बहिर्मुख हो जाती है। (इस स्थिति में) क्रियाशक्ति की प्रधानता आती है। उसका स्वरूप प्राणरूप³ जीव स्वभाव है। वही प्राण पाँच रूपों से क्योंकि शरीर को सम्पूर्णरूप से पूर्ण रखता है इसलिए शरीर चेतन सा प्रतीत होता है। उस क्रियाशक्ति के पहले भाग में काल रूप अध्वा, दूसरे भाग में मूर्ति वैचित्र्यरूप देशाध्वा की स्थितियाँ हैं।⁴ वर्ण, मन्त्र, पद रूप अध्वाओं की स्थिति कालाध्वा में है, क्योंकि ये पर, सूक्ष्म और स्थूल रूप १. कालशक्ति के योग से संवित् अपने के साथ अभिन्न रूप में जो स्थित है, उसे क्रम तथा अक्रम रूप कल्लना के द्वारा बाहर स्फुट रूप से अवभासित करती है और इसके फलस्वरूप वही प्राणना रूप वृत्ति का रूप धारण करती है। २. संवित् वास्तविकता से शुद्ध प्रकाश रूप है। उसी संवित् में प्रमातृ प्रमेय रूप विश्व अविभक्त अवस्था में स्थित रहता है। संवित् अपनी स्वतन्त्रता से विश्वरूप मेय को अपने स्वरूप से अलग कर देती है और 'मैं विश्वोत्तीर्ण हूँ' इस प्रकार आमर्शन करती है—यही संवित् की शून्यरूपता है। ३. पहले जो शून्य प्रमाता का उल्लेख किया गया है उसी का बहिर्मूख प्रसरण ही प्राण है। स्वविमर्श रूप जो ईषत् चलन है जिसे स्पन्दन कहते हैं, उसी का प्राथमिक प्रसरण ही प्राण का रूप धारण करता है। शून्यता के आभासन के अनन्तर संवित् प्राणरूप में स्फुरित होती है—इसलिए कहा गया है—'प्राक् संवित् प्राणे परिणता', संवित् ही प्राण है। प्राण उससे भिन्न कोई वस्तु विशेष नहीं है। ४. समग्र अध्वाओं को पहले दो भागों में देखे जाते हैं—एक है कालाध्वा और दूसरा देशाध्वा है, क्रिया के साथ जिस अध्वा का सम्बन्ध है उसे कालाध्वा कहते हैं, और विभिन्न प्रकार भाव या विषय जैसे घर, आँगन, देवालय आदि देशाध्वा के अन्तर्गत हैं। फिर काल तथा देश रूपो अध्वाओं के सूक्ष्म और स्थूल रूप हैं, जो तीन-तीन भागों में विभक्त हैं। दोनों अध्वाओं की कुल संख्या छः हैं।

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