तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअब बाह्यविधि का वर्णन है वही ( बाह्यविधि ) स्थान प्रकल्पन शब्द से उल्लिखित हुआ है । उसमें स्थान तीन प्रकार हैं—प्राणवायु, १ शरीर और बाहर की वस्तुयें । २ उसमें प्राण की विधि ( निम्न प्रकार हैं ) । सब प्रकार आगे आलो- चनीय अध्वाएँ प्राण में स्थित हैं ३—इस प्रकार कलना की जाती है । प्राण के क्रम तथा अक्रम ४ से जो कलना है वही काल है । यह काल परमेश्वर के स्वरूप का अन्तर्गत है । उसकी भासना देव परमेश्वर की काली नाम की शक्ति ५ से होती है । भिन्न बनाकर ( बाहर प्रस्फुट रूप से उनका आभासन क्रम और १. प्राणवायु का पहला रूप सामान्य स्पन्दात्मक है और उसका दूसरा रूप शरीर में प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान आदि विशेष वृत्तियों के रूप धारण कर स्थित है । २. शरीर के बाहर जिन वस्तुओं के सहारे लोग परमार्थ प्राप्ति के लिए प्रयत्न करते हैं वे ग्यारह प्रकार के हैं, जैसे मण्डल, स्थण्डिल, पात्र, अक्षसूत्र, पुस्तक, लिङ्ग, तूर, पट, पुस्त, प्रतिमा और मूर्ति । ३. सामान्य स्पन्दात्मक प्राण में ६ प्रकार की अध्वाएँ स्थित हैं । ४. भावों की कलना क्रम से तथा अक्रम से होती है । कलना के कारण ही वस्तुओं में परिच्छिन्नता आती है । इस प्रकार कलना करने वाला ही काली है । भावों का अवभास दो प्रकार से होता है—एक तो क्रम से, जैसे कार्य और कारणों का, और दूसरा चित्र सम्बन्धी ज्ञान अक्रम से होता है । जैसे एक ही चित्र में पूर्व काल में स्थित वस्तुएँ समान काल में स्थित वस्तुओं की अपेक्षा करती हुई बिना किसी क्रम से भासित होती हैं । ५. संवित् नित्य होने के कारण उसमें काल का सम्बन्ध कैसे हो सकता है हृदय में इस प्रकार आशय रखते हुए ग्रन्थकार ने कहा है कि प्रकाशरूप परमेश्वर ही अपनी इच्छा से प्रमातृ प्रमेयरूप जगत् की कलना करते हैं; उनकी कलना करने वाली शक्ति ही काली है । वस्तुतः उनमें कोई क्रम या अक्रम नहीं है ।