भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

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४४ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ५ बाद बाहर प्राण का उदय होता है। वहाँ भी उस बाह्य का अपानरूपी चन्द्र के द्वारा आपूरण होने पर उसकी सर्वात्मतारूप को देखता है, उसके बाद वह दूसरे के प्रति आकांक्षा रहित होता है, उसके अनन्तर समान के उदय होने पर सब विषयों के परस्पर मेलनरूप विश्रान्ति का अनुभव करता है, उसके बाद उदानरूप अग्नि के उदय होने पर प्रमाता, प्रमेय रूप कलना का ग्रास होता है। उसके ग्रास करनेवाली अग्नि के प्रशमन हो जाने पर व्यान का उदय होता है, तब सब प्रकार की अवच्छिन्नता (संकोच) हट जाती है। इस प्रकार शून्य से व्यान तक ये जो विश्रान्तियाँ हैं उन्हें निजानन्द¹, निरानन्द², परानन्द³, ब्रह्मानन्द³, महानन्द⁴, चिदानन्दरूप⁵ छः आनन्दभूमियों के रूप में उपदेश किये गये हैं जिनका १. चैतन्यशक्ति शून्यता के अवभासना के बाद प्राणरूप धारण करती है। प्राण जड़ और चेतन दोनों धर्मों से युक्त है, क्योंकि परमेश्वर ने अन्य जड़ों से भिन्न बनाकर इसमें अपनी अहन्ता रूप कर्तृत्व प्रदान किया है और इसे ग्राहक बनाया है। यही प्राण प्रमातृ भूमि में निजानन्द रूप है, लेकिन जब प्रमाता प्रमाण भूमि को स्पर्श करता हुआ प्रमेय की ओर आगे बढ़ता है अर्थात् प्राण जब स्वल्प मात्रा में बहिर्मुख होता है तब उस आनन्द का नाम पड़ता है निरानन्द क्योंकि उस समय वह प्रमातृगत आनन्द से रहित हो जाता है। २. परानन्द—प्रमेय वस्तु के उदय होने पर इस प्रकार आनन्द की भावना होनी चाहिए। अपान के उदय से प्रमेय का उदय माना जाता है। प्रमेय के उदय के कारण भिन्नता आ जाती है इसलिए यह आनन्द निजी नहीं आत्मा से किञ्चित् भिन्न का है—इसलिए इसे परानन्द कहते हैं। ३. समान भूमि में समग्र प्रमेय घुलमिलकर एक बन जाता है। उस समय उनके परस्पर के सम्मिलन से जिस आनन्द का विकास होता है उसमें बृहत्त्व और बृंहितत्व दोनों गुणों के समावेश के कारण उसे ब्रह्मानन्द कहा जाता है। ४. प्राण और अपानों के प्रतिदिन की जो कलनाएँ हैं, जिसकी संख्या २१६०० हैं, योगी मध्यमार्ग में उन्हें विलयन कर सकने पर वही प्राण उदान रूप धारण करता है। उदान वह्निरूप है, उस समय प्रमातृगत आनन्द का अनुभव होता है—उसे स्वात्म-विमर्शमय रूप में चिन्तन करना चाहिए। इसका नाम महानन्द है। ५. उपर्युक्त महानन्द के विश्राम के अनन्तर महाव्याप्ति का उदय होता है।