तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआ. ५ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ४५ एक अनुसन्धाता है। उसका न तो उदय है न अस्त, अन्तर्विश्रान्ति ही जिसका परमरूप है, वह जगदानन्द है। इन उच्चारभूमियों में प्रत्येक को दो-दो बार अथवा सम्पूर्ण रूप से विश्रान्त करा कर शरीर और प्राणों से भिन्न विश्रान्ति का स्वरूप का अनुभव (योगी) प्राप्त करता है। विश्रान्ति तत्त्व ही सृष्टि और संहार बीज¹ के उच्चारण का रहस्य है—इसके अनुसन्धान करते हुए उसे विकल्पों का संहार करना चाहिए। इन विश्रान्तियों के प्रत्येक में पाँच-पाँच स्थितियाँ हैं जो प्रवेश के तार- तम्य के कारण उदित होती हैं। उसमें प्रागानन्द² (चमत्कार विशेष है) क्योंकि उस समय पूर्णता का स्पर्श हो जाता है। इसके बाद उद्भव है— उस समय सब प्रकार उपाधिरहित व्यान के उदय के साथ-साथ सब जड़ों से सम्पर्कहीन चिदानन्द का अनुभव होने लगता है। १. सृष्टि बीज 'स' कार है और संहार बीज 'ह' कार है। २. प्रागानन्द, उद्भव, कम्प, निद्रा, घूर्णि ये पाँच पारिभाषिक शब्द हैं। जिनकी व्याख्या निम्न प्रकार है। शरीर आदि को साधन बनाकर परम तत्त्व में प्रवेश पाने के इच्छुक योगी, पूर्णता के प्रति उन्मुख होते ही एक प्रकार आनन्द का अनुभव करते हैं। उनमें वास्तविक उन्मुखता की स्थिति आ जाने पर पहले आनन्द रूप चमत्कार-विशेष निज अनुभव में आता है। यह पहली स्थिति है। उसके बाद बिजली के क्षणिक प्रकाश से जैसे सभी वस्तुएँ एक-सी हो जाती हैं—सभी प्रकाशमय हो जाते हैं; उसी प्रकार योगी के शरीर में जो आत्मबोध पहले विद्यमान था वह उस क्षणिक प्रकाश से कट जाता है। इसे ग्रन्थिभङ्ग के रूप में वर्णित किया जा सकता है। ग्रन्थिभङ्ग के साथ-साथ नीचे की भूमि के साथ जो सम्बन्ध पहले था वह कट जाता है और योगी परधाम की ओर बढ़ता है—यह ऊर्ध्वगमन रूप है। इसे उद्भव कहते हैं। यह क्षणभर के लिए उत्पन्न होता है, बराबर के लिए होने पर परिपूर्णता आ जाती है, लेकिन इससे योगी का विशेष लाभ अवश्य होता है। इस क्षणिक स्पर्श से संवित् के जो अहन्तारूप बल है और जो आत्मा में आत्माभिमान रूप है उसका उदय होता है। इसके फलस्वरूप अनात्मा में आत्माभिमान गलने लगता है, पारिभाषिक शब्द से इसे कम्प कहते हैं। निद्रा के समय वाह्य वृत्ति का उपरम होता है और आन्तर विषय भी उस समय अस्फुट रहता है, उसी प्रकार योगी को भी संवित् के साथ