भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

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पृष्ठ 127

४६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ५ उस समय क्षणभर के लिए अपने अन्दर शरीर सम्बन्धी दृढ़ भावना कट जाती हैं, उसके बाद कम्प है जिसके उदय से अर्थात् उसके बल के द्वारा शरीर विषयक तादात्म्यबोध शिथिल हो जाता है । इसके बाद निद्रा है, क्योंकि उस समय बहिर्मुखता का विलयन हो जाता है । इस प्रकार अनात्म-विषयों में आत्मभाव कट जाने पर आत्मा की सर्वमयता के कारण आत्मा में अनात्मभाव विलीन होता है। इसलिए इसके बाद घूर्णि है, क्योंकि उस समय महाव्याप्ति का उदय हुआ है। ये सब जाग्रत आदि भूमियां १ हैं, तुर्यातीत जिनका अन्त है। ये भूमियाँ त्रिकोण, कन्द, हृदय, तालु और ऊर्ध्वकुण्डली आदि चक्रों के प्रवेश के समय अनुभव में आते हैं। इस प्रकार उच्चारण के विश्रान्तियों में निखिल वेद्य जहाँ विलीन हो गया है, जहाँ वेद्य उन्मेषभाव को प्राप्त कर रहा है, जहाँ वेद्य उन्मिषित है--ये तीन स्थितियाँ तीन प्रकार के लिङ्गरूप २ हैं जिसके बारे में अनुकूल समय पर आगे बतलायेंगे। परलिङ्ग योगिनी हृदय रूप है। इनमें जो मुख्य है वह स्पन्द स्वरूप है, जब संकोच और विकासात्मक स्वरूप की प्राप्ति होती है तब यामलरूप का उदय होता है और अन्त में तादात्म्य के अनुभव होने के पहले इस प्रकार की निद्रा स्थिति के सम्मुख होना पड़ता है। यह स्थिति सामयिक है। इसके अनन्तर परासंवित् ही सब वस्तुओं का परम स्वरूप है, उससे अतिरिक्त कुछ भी नहीं है—इस प्रकार स्थिति के उदय के साथ-साथ ऊर्ध्व गति का अवसान हो जाता है और योगी परासंवित् के साथ तदात्मता प्राप्त करता है। इसे घूर्णि कहते हैं, यह महाव्याप्ति रूपी है। १. किन-किन भूमियों में प्रागानन्द आदि विभिन्न प्रकार के अनुभव होते हैं उनका निर्देश ग्रन्थकार ने दिया है—(१) त्रिकोण है जिसे मूलाधार कहते हैं, (२) कन्द है जो उद्भव स्थान है, (३) कम्प का स्थान हृदय है, (४) तालु स्थान निद्रा का, ५. घूर्णि ऊर्ध्वकुण्डली या द्वादशान्त है। २. लिङ्ग तीन हैं—(१) व्यक्त, (२) व्यक्ताव्यक्त, (३) अव्यक्त। सब प्रकार की गतियों के विराम होने पर जो स्पन्ददशा का उदय होता है वही अव्यक्त लिङ्ग का स्वरूप है। इसी दशा से विश्व का उदय और विलयन होते हैं, इसलिए इसे लिङ्ग कहते हैं। व्यक्ताव्यक्त लिङ्ग 'इदमहं' प्रतीति रूप है। व्यक्तलिङ्ग विशेष स्पन्दरूप है।