भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

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पृष्ठ 128

आ. ५ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ४७ विसर्ग कला रूप विश्राम की प्राप्ति होती है। अब अधिक कहने से विरत रहता हूँ। इसमें अनुप्रवेश का मार्ग अप्रकाशनीय है। ✕ ✕ ✕ जो पूर्ण हैं वह अपने बोध में स्थित है, इसके अनन्तर प्रमेय में विश्राम लेकर मेय का आपूरण कर देते हैं, अन्त में मातृ मेय आदि विभागों को वह शीघ्र ही पूर्णस्वभाव में संहार करता है। ✕ ✕ + व्याप्ति के द्वारा जो विश्रान्ति आती है वे सब शून्य के साथ छः उपाय रूप भूमियाँ हैं। प्राण से लेकर व्यान जिसका अन्त है उनमें जाग्रत् आदि प्रपञ्च अन्तर्गत हैं। ✕ ✕ ✕ इस विषय में अभ्यासशील व्यक्ति सृष्टि संहार रूप विमर्शधाम में बिना बिलम्ब से आरूढ़ हो सकता है। ✕ ✕ ✕ इस विषय में अन्तर्गत श्लोक इतने हैं। उच्चारण की इति यहाँ है। अब सूक्ष्म प्राणात्मक वर्ण का विवरण है। इस उच्चारण में अव्यक्त की अनुकरण करने वाली ध्वनि जो निरन्तर स्फुरित होती है¹ वर्ण कहते हैं। सृष्टि और संहार बीज ही उसका १. प्राण की गति दो प्रकार हैं—एक स्पन्दरूप है और स्वाभाविक है और दूसरा क्रियात्मक तथा प्रयत्नजन्य है। प्राणात्मक उच्चार से एक अव्यक्त ध्वनि सदा ही स्फुरित होती रहती है जिसे अनाहत नाद कहते हैं। प्राणिमात्र के हृदय में यह स्वभाव से सर्वदा चलता रहता है—इसके उच्चारण करने वाला कोई नहीं है, न तो इसके रोकने वाला कोई है। अविभक्त रूप में सब वर्ण इसमें रहते हैं। यह सब वर्णों के कारण भी हैं, इसलिए अनाहत नाद भी वर्णपद वाच्य है। नाद के दो विभाग दृष्टिगोचर होते हैं—एक जो सदा प्रकाशमान है और जिसका तिरोभाव कभी नहीं होता ! इसका उदय ही होता है, अस्त नहीं होता। इसका जो दूसरा रूप है जो अपेक्षाकृत कम सूक्ष्म है, उसका उदय तथा अस्त दोनों ही हैं। नाद का जो सूक्ष्म रूप है जिसे सब वर्णों के अविभक्त रूप में वर्णित किया गया है वह अव्यक्त है। सृष्टि और