तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ५ स्वरूप है। उसके अभ्यास से परासम्वित् की प्राप्ति होती है। जैसे 'क' से 'स' तक वर्णों को स्वर के साथ या बिना स्वर से प्राण के साथ हृदय से उच्चारण करने पर या स्मरण करने पर संवित्-स्पर्श का अनुभव होता है। समय¹ की अपेक्षा न होने के कारण यह परिपूर्ण है, समय की अपेक्षा रखने वाले शब्द भी (अर्थात् लौकिक शब्द ) तत्तत् विषयों की भावना करने वालों को मन के द्वारा कल्पित राज्य के समान ( विषय को ) प्राप्त कराता है।² अनुत्तर-संवित् के स्पर्श से हृत् ( अ ), कण्ठ ओष्ठ ( औ ), दो द्वादशान्त और हृदय को एक बनाना चाहिए—वर्णों का यही रहस्य है। किसी-किसी का कथन है कि हृदय में स्फुरित विमर्श से उद्भूत श्वेत पीत आदि आन्तर वर्ण की भावना ही संवित् को अनुभव में लाते हैं। × × × संवित् रूप स्पन्द से जिसमें वाच्य के अभाव होने के कारण सोम और सूर्य की गतियों के निरोध के द्वारा चिद्बीज और पिण्ड वर्ण विधि में समान रूप में प्रवेश होने पर पूर्णता आ जाती है। यह आन्तर श्लोक है। वर्णविधि की समाप्ति यहाँ है। मुद्रा सम्बन्धी विचार के समय करण की चर्चा करेंगे। संहार बीज ही उसका मुख्य रूप है, अर्थात् इन दो बीजों का रूप धारण कर नाद अभिव्यक्त होता है। इसलिए इन दोनों बीजों के सहारे नाद का परामर्श होना चाहिए । १. जैसे जब कोई वृद्ध पुरुष किसी बालक को घट से परिचित कराते समय 'पृथुबुध्न उदर' युक्त किसी आकार को दिखलाकर 'यह इसका अभिधेय है' इस प्रकार जो कल्पित वाच्यवाचक रूप सम्बन्ध डालता है उसे ही समय कहते हैं । इस समय को ही संकेत कहते हैं । २. घट आदि शब्द के उच्चारण करते हुए पुरुष भी अपनी संवित् में घट आदि का साक्षात्कार करता है, जैसे कोई पुरुष काम या शोक से पीड़ित होकर कान्ता सम्बन्धी गम्भीर भावना के कारण कान्ता रूप को सामने प्रत्यक्ष देखता है। सान्त वर्ण समूह संवित् के साथ अभिन्न हैं, इसलिए सृष्टि आदि बीजों से अभिव्यक्त होने वाले नाद का पुनः-पुनः उच्चारण तथा स्मरण करने पर योगी चित् स्वरूप के साथ एकात्मता का अनुभव करता है ।