भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

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आ. ७] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [७१ नहीं अर्थात् असंख्य हैं। इसके बाद पृथ्वी तत्त्व का दस गुणा जलतत्त्व है। इसके बाद उत्तरोत्तर दसगुणा अन्य तत्त्व है। इस प्रकार अहंकार तक है। वे इस प्रकार है—जल, तेज, वायु, आकाश, तन्मात्र-पंचक, एकादश इन्द्रियाँ जिनको अपने अन्दर रखकर अहंकार है। अहंकार का दसगुणा बुद्धितत्त्व है। उससे हजार गुणा बड़ा प्रकृतितत्त्व है। उससे हजार गुणा बड़ा प्रकृतितत्त्व है—इतने तक प्रकृत्यण्ड है। प्रकृतितत्त्व से पुरुषतत्त्व दशसहस्रगुणा व्यापक है। पुरुष से नियति लक्षगुणा व्यापक है। नियति से उत्तरोत्तर दश दशलक्षगुणा कलातत्त्व तक तत्त्व समूह है। वे जैसे— नियति, राग, अशुद्धविद्या, काल और कला प्रभृति हैं। कलातत्त्व से कोटिगुणा माया, इतने तक मायाण्ड है। माया तत्त्व से शुद्धविद्या दशकोटि गुणा व्यापक है। विद्यातत्त्व से ईश्वरतत्त्व शतकोटिगुणा व्यापक है। ईश्वरतत्त्व से सादाख्यतत्त्व सहस्र- कोटिगुणा व्यापक है। सादाख्य से शक्तितत्त्व वृन्द गुणा है—इतने तक शक्त्यण्ड है। यही शक्ति समग्र अध्वा को व्याप्तकर अन्दर और बाहर वर्तमान है इसलिए यह व्यापिनी है। ये सब तत्त्व समूह उत्तरोत्तर आवरण के रूप में वर्तमान हैं—पूर्व तत्त्व व्याप्य है और उत्तर तत्त्व उसके व्यापक हैं—इस क्रम से वे स्थित हैं। यावतीय अशेष शक्तितत्त्व तक अध्वाएँ शिवतत्त्व से व्याप्त हैं। लेकिन शिवतत्त्व अमेय है—सब अध्वाओं से परे हैं और सब अध्वाओं के व्यापक हैं। इन तत्त्वों के अन्तराल में जो-जो भुवन हैं उनके अधिपति इस पृथ्वी में स्थित हैं। उन भुवनों में जो मरते हैं२ उन उन स्थानों में उन्हें गति प्रदान करते हैं। अधिपति हैं, वे रुद्र हैं। प्रतिदिशा में दस-दस रुद्र हैं, इसलिए १० × १० = १०० रुद्र दस दिशाओं में हैं जो शतरुद्र कहलाते हैं। १. प्रत्येक तत्त्व के अन्तर्गत कई भुवन हैं। पृथ्वी तत्त्व में जैसे भुवन हैं, उसी प्रकार सभी तत्त्वों के साथ कुछ भुवनों का सम्बन्ध है। कर्म से बद्ध अणुओं के भोग के लिए भोग के साधन रूपी शरीर, इन्द्रिय और भुवनों की उत्पत्ति होती है। भुवन भोग के अधिकरण हैं। प्रत्येक भुवन में अधिकारी पुरुष होते हैं, जो भुवनेश्वर कहलाते हैं। २. शिवदीक्षा से दीक्षित जीव पार्थिव या आग्नेयी धारणा से सिद्ध होकर देह छोड़ने के अनन्तर तत्तत् भुवनों में जाते हैं और तत्तत् भुवनेश के साथ सायुज्य प्राप्त करते हैं।