तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदेशाध्वा मूर्ति वैचित्र्य के आभासनात्मक-शक्ति से उत्पन्न समग्र देशरूप अध्वा¹ संवित् में ही स्थित है। संवित् रूप द्वार से² शून्य, बुद्धि, प्राण, नाड़ीचक्र और उनसे उत्पन्न अनुचक्रों में और बाहरी शरीर से लेकर लिंग, स्थण्डिल, प्रतिमा आदि में समस्त अध्वा की परिपूर्णता होती है। उस समग्र अध्वा को देह में विलयन कर, शरीर को प्राण में, उसे बुद्धि में, उसे शून्य में, फिर उसे संवित् में विलयन कर छत्तीस तत्त्वों के स्वरूप के ज्ञाता जीव परिपूर्ण संवित्स्वरूप बन जाता है, इससे भी उत्तीर्ण संवित् को परमशिव रूप में ग्रहण करते हुए उनकी विश्वमयी स्थिति का भी अनुभव करता है। अथवा माया गर्भ में स्थित किसी अधिकारी पुरुष जैसे ब्रह्मा, विष्णु आदि जो प्रमेय कोटि में अवस्थित हैं उसे परम इष्ट रूप में ग्रहण कर सकता है, तो भी उसे प्रक्रिया-ज्ञान पर होना पड़ेगा। जैसे कहा गया है— ‘प्रक्रिया से परे ज्ञान नहीं’ पृथिवीत्तत्त्व शतकोटि विस्तृत है जो ब्रह्माण्ड गोलक रूपी है³। उसके अन्दर कालाग्नि, नरक, पाताल, पृथिवी, स्वर्ग और इनकी अवधि ब्रह्मलोक तक है। ब्रह्माण्ड के बाहर शतरुद्र⁴ हैं। ब्रह्माण्ड की कोई संख्या १. पहले कालरूप अध्वा का विवरण प्रस्तुत किया गया है, अब देशरूप अध्वा का विवरण प्रस्तुत किया जा रहा है। २. संवित् ही अपनी स्वतन्त्रता से अपने स्वरूप को गोपन करती हुई स्वयं ही शून्य प्रमाता, प्राण प्रमाता, बुद्धि प्रमाता और देह प्रमाता आदि का रूप धारण करती है और उन प्रमाताओं के सम्मुख प्रमेयरूपी भावराशि को अपने से भिन्न न होते हुए भी भिन्नरूप में अवभासित करती है। गृह, आंगन, देवालय आदि भाव समूह ही मूर्तियाँ हैं। ३. ब्रह्माण्ड अति विशाल है, जो पृथ्वी तत्त्व के अन्तर्गत है। जलतत्त्व से प्रकृति तक अण्ड का नाम प्रकृत्यण्ड है। पुरुष तत्त्व से माया तक जो अण्ड है उसका नाम मायाण्ड है। शुद्ध विद्या से सदाशिव तत्त्व तक जिस अण्ड का विस्तार है, वही शक्ति अण्ड है। इस प्रकार अण्ड चार हैं। ४. दस दिशाओं में जैसे इन्द्रादि लोकपाल हैं, वैसे प्रतिदिशा के लोकेश के जो