तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
पृष्ठ 164, कुल 294 में से
संदर्भ में पढ़ेंआ. ८ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ८३ उस प्रकार घट का निर्माण नहीं होता है। कार्यकारणभाव का इस प्रकार कल्पना होने पर विभिन्न शास्त्रों में विभिन्न तत्त्वों की जो बहु विचित्रताएँ दिखलाई पड़ती हैं वह भी युक्तिसिद्ध बन जाती है जैसे गोबर से, कीट से, योगी की इच्छा से, मन्त्र से, वृश्चिक के आविर्भाव के सदृश इस विषय में अपने तन्त्र की दृष्टि से उसे कल्पित ही मानता हूँ, पारमार्थिक नहीं। परमेश्वर पाँच शक्तियोंसे परिपूर्ण हैं ऐसा कह गया हैं। वे अपनी स्वतन्त्रता से ( उन पाँचोंमें ) किसीको मुख्यरूप से प्रकट करते हुए स्थित रहते हैं। चित् शक्ति की प्रधानता¹ आने पर वही शिवतत्त्व है, आनन्द की प्रधानता में शक्तितत्त्व, इच्छा की प्रधानतामें सदाशिवतत्त्व है। यह इच्छा ज्ञान और क्रिया का साम्यरूप है और उसका अभ्युपगम स्वभाव है। ज्ञानशक्ति की प्रधानता में ईश्वरतत्त्व, क्रियाशक्ति की प्रधानता में विद्यातत्त्व है। इन तत्त्वों के अधिपति शिव, शक्ति, सदाशिव, ईश्वर और अनन्त हैं। ब्रह्मा जैसे निवृत्ति कला के अधिष्ठाता हैं। सामान्यरूपी इनके जो अनुगामी हैं वे भी पाँच हैं जैसे शाम्भव, शाक्त, मन्त्रमहेश्वर, मन्त्रेश्वर और मन्त्र-इस प्रकार शुद्ध अध्वा है। इतने दूर तक साक्षात् शिव ही कर्ता हैं। लेकिन अशुद्ध अध्वाको अनन्त जिनका दूसरा नाम अघोरेश हैं, सृजन करते हैं, क्योंकि ईश्वर की इच्छा से क्षुब्ध संकुचित आत्मवर्ग के भोग की सिद्धि के लिए ( ऐसी सृष्टि होती है ) । यहाँ लोलिक शब्द का अर्थ अपूर्णम्मन्यता ( मैं संकुचित हूँ इस प्रकार अभिमान ) रूप परिस्पन्द है जो विषय विहीन अभिलाषमात्र ही है और जिसमें भविष्य में परिच्छिन्नता की योग्यता है² इसलिए मल पुरुष का कोई पृथक् तत्त्व नहीं है। लेकिन रागतत्त्व कर्माविच्छिन्न १. यद्यपि कर्म ही संसार का कारण है लेकिन अपूर्णम्मन्यता अर्थात् अपना पूर्ण ज्ञान स्वरूप की अख्याति या अज्ञान अर्थात् संकुचित ज्ञान कार्म मल का भी कारण है। मल कोई दूसरा तत्त्व नहीं है, इसके उत्तर में कहा गया है कि मल क्रिया रूप नहीं है, अपितु इच्छामात्र है। भविष्य में जिन जीवों में जो परिच्छिन्नता आनेवाली है उसकी योग्यता मात्र इसमें है। २. 'मुझे कुछ प्राप्त हो' इस प्रकार सामान्याकार कर्म है।