भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

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८२ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ८ के अभाव से नहीं। इसलिए सामग्री¹ की कारणता युक्तिसिद्ध है वह सामग्री स्वतन्त्र चैतन्य के असामान्य शक्ति ( महिमा ) के कारण सब प्रकार भावों को एक सूत्र में ग्रथित करनेवाली बनती है। वह सामग्री नियम पूर्वक अपने-अपने देश और कालरूपी भाव समूह का स्वभाव धारण करती है और भिन्न भिन्न वस्तुओं के निर्माण के समय तत्तत् रूप धारण करता है। सामग्री एक ही प्रकार रहने पर भी सहकारी कारणों का समावेश जैसे जैसे अधिक होने लगता है कार्य भी अन्य प्रकार बन जाता है। इससे कार्यों के विभिन्नरूपता में जो तरतमभाव है उसकी पुष्टि होती है। इस प्रकार हम देखते हैं कि चैतन्यस्वरूप स्वतंत्रस्वभाव परमेश्वर ही विश्वभावमय शरीर धारण करते हुए घट के निर्माता है, कुम्भकार का चैतन्य भी उनसे अभिन्न है। कुम्भकार का शरीर भी ( घट आदि के समान ) भावराशि में स्थित है। अब प्रश्न उठाता है ऐसे होने पर कुम्भकार शरीर में कर्तृत्व का अभिमान कैसे होता है ? इसका उत्तर यह है कि यह अभिमान परमेश्वर द्वारा ही कृत है जो घट आदि के समान होगा। अतः सामग्रीबाद। (घट के निर्माण में दण्ड, चक्र आदि) भी विश्व- शरीर संवित् की ही कर्तृता का ही समर्थन करता है। मेरु में रहकर १. त्रिक दर्शन में सात प्रकार प्रमाताओं का उल्लेख मिलता है। ये प्रमाताएँ प्रलयाकल, विज्ञानाकल, मन्त्र, मन्त्रेश्वर, मन्त्रमहेश्वर और शिव हैं। मल तीन प्रकार हैं—आणव, मायीय और कार्म। अणु शब्द से पूर्ण अहं बोध से शून्य संकुचितम्मन्य जीव को समझना चाहिए। इस मल का स्वरूप दो प्रकार हैं—१. चैतन्यरूपी आत्मा में आत्मत्व ज्ञानाभाव है, २. अनात्मा अर्थात् देह आदि में आत्मबोध है। मायामल भिन्नवेद्यता बोध है। कार्ममल पुण्य तथा पाप कर्मरूप है। इन मलों को पाश भी कहते हैं। पाश से सम्बद्ध जीव भी तीन प्रकार हैं—जैसे विज्ञान केवल, प्रलयाकल और सकल। सकल जीव तीनों प्रकार पाशों से बद्ध हैं। लेकिन उनमें जिनके मल परिपक्व हो जाते हैं उनमें से ११८ शिवजी के अनुग्रह से मन्त्रेश्वर दशा प्राप्त करते हैं। प्रलयाकल जीवों में जिनके मल परिणत हो जाते हैं उनमें से कुछ भुवनों के स्वामी बनते हैं। विज्ञान केवली जीव आणव मल से युक्त हैं—ये दो प्रकार हैं—एक समाप्त कलुष जो विद्येश्वर दशा को प्राप्त करते हैं और जो असमाप्त कलुष हैं वे सात करोड़ महामन्त्र रूप हैं।