तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआ. ८ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ८१ वह ( कार्यकारणभाव ) जितने अंश में जब नियम से पूर्व और अपर भाव के रूप में अवभासित होता है उसमें यद्यपि दण्ड, चक्र, आदि कारण अधिक जैसे है तो भी स्वरूप का अनुगम इतने दूर तक भी वर्तमान है । इसलिए योगी की इच्छा से अंकुर का उद्गम होता है और बीज से भी होता है; स्वप्न आदि में घट से भी होता है । वहाँ भी परमेश्वर की कर्तृता का अभाव नहीं रहता है, अतः अकल्पित पारमार्थिक सत्ता वहाँ भी वर्तमान हैं। पारमार्थिक ' स्थिति सभी का आधार है इसलिए कल्पित कार्यकारणभाव की चर्चा जो की गयी है वह सम्भव हो सकता है, अन्य प्रकार से अर्थात् पारमार्थिक सत्ता भैरव के बिना कैसे सम्भव है । इस प्रकार अद्वैतदृष्टि से देखने पर सभी संविदात्मक प्रतीत होने लगता है । १. शिव स्वरूपतः चिन्मात्र स्वभाव हैं। वह पूर्ण हैं और सर्वथा अभिलाष- शून्य हैं । मायिक भूमि में जीवों में जो अभिलाषाएँ उठती हैं वे किसी प्रकार अभावबोध के कारण ही उठती हैं । परिपूर्ण-स्वभाव परमेश्वर में किसी प्रकार अभाव न रहने के कारण अभिलाषा का होना सम्भव नहीं । उनमें निरन्तर अपने चमत्कार रस का आस्वादन की उन्मुखता स्वातन्त्र्य- वश आती हैं । जो तत्त्वपञ्चक शिव, शक्ति, सदाशिव, ईश्वर और शुद्ध विद्यारूप हैं वह माया के ऊपर स्थित शुद्ध अध्वा में स्थित है और तुर्यरूप है, स्वातन्त्रता के कारण ये तत्त्वपञ्चक चमत्कार रस का ही तरतमभाव है, इस तारतम्य के कारण सबसे पहले अहं रूप शक्तिदशा अवलम्बित कर परम संवित् प्रकाशमान है । इसके अनन्तर 'अहमिदं' इस प्रकार परा- मर्शात्मक अवभासना होती है । शुद्ध चिन्मात्र रूप अधिकरण जो 'अहं' इत्याकारक है उसमें अस्फुट चित्र के समान 'इदं' प्रकाशमान है । यह परामर्श 'अहमिदं' रूप है, जहाँ अहं ही मुख्य है, इदं गौण है । इस सदाशिव तत्त्व के अन्तर्गत मन्त्रमहेश्वर रूपी जो प्रमातृवर्ग हैं उनके सम्मुख अन्तःकरण-वेद्य पदार्थ के समान जो चित् विशेष सामान्य है वही सदाशिव- तत्त्व है । मन्त्रेश्वररूपी प्रमाता के सम्मुख वही 'इदमहं' इस प्रकार परा- मर्शात्मक होकर स्फुट चित्र के समान भासता है, वही ईश्वर तत्त्व है— यहाँ इदं रूपी वेद्य अहं के साथ अभिन्न होकर भासता है। इस परामर्श में अहं गौण है, इदं मुख्य है । शुद्धविद्या में ये गौणमुख्यभाव नहीं रहता है, इस तत्त्व में जो प्रमातृवर्ग है वे मन्त्र कहते हैं । ६