तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ८ पारमार्थिक कार्यकारणभाव इतना तक है कि कर्तृस्वभाव¹ स्वतन्त्र परमेश्वर ही शिव से आरम्भ होकर पृथ्वी तक तत्त्वशरीर स्वयं धारण करते हुए अपने स्वरूप से अभिन्न अथच अपने में ही विश्रान्त होकर प्रकाशमान हैं। कल्पित कार्यकारणभाव भी परमेश्वर की इच्छा से नियति के बल से² निर्मित है। १. किसी भी कार्य की उत्पत्ति में चेतनकर्तृकता अवश्य ही स्वीकार करना पड़ता है। इसका तात्पर्य यह है कि जब तक चेतन सत्ता का सन्निधान न हो तब तक अन्य बहुविध सामग्री की उपस्थिति रहने पर भी वस्तु की उत्पत्ति नहीं होती है। घट के निर्माण में दण्ड, चक्र, मृत्तिका और कुम्भकार आदि को कारण माने जाते हैं, लेकिन अलग-अलग रूप में ये कारण नहीं अपितु जब सभी एकत्रित होकर सन्निहित होते हैं तभी वे सामग्री कहलाते हैं। इस तान्त्रिक सिद्धान्त के अनुसार इन सबका पर्यवसान या विश्रामभूमि वास्तव में संविद्रूपी प्रमाता है। वही सामग्री है। २. लौकिक दृष्टि में जो कार्यकारणभाव है वह नियतिनियन्त्रित है, लेकिन पारमार्थिक कार्यकारणभाव अभेदनिमित्तोपादान होने के कारण अर्थात् चिति या चैतन्य ही जगद्रूप में भासित होने के कारण कार्यकारणभाव पारमार्थिक है। इस विषय में परात्रिंशिका विवरण में जो स्पष्टीकरण मिलता है उससे धारणा स्पष्ट हो सकता है। पृथ्वी से लेकर शिव तक जितने तत्त्व हैं वे सभी अपने अस्तित्व के लिए पूर्ववर्ती तत्त्व पर निर्भर हैं। पृथ्वी जल के द्वारा धृत है, जल से ही उसकी कठिनता आती है। इसी प्रकार सभी भूतों का अस्तित्व बिना तन्मात्रा से, तन्मात्रायें भी इन्द्रियों के जृम्भण के बिना, इन्द्रियों का जृम्भण तत्तत् अध्यवसाय के बिना, और ये सब आदि तथा अविभक्त, सब पदार्थों में अन्वित सूक्ष्मरूपी मूलकारण के बिना, फिर यह मूलप्रकृति भी भोग्य होने के कारण भोक्ता के बिना, फिर भोक्ता पुरुष भी सभी भोग्य वस्तुओं के विभागभागी है, इसलिए संकुचित है। इस प्रकार जो संकोच पुरुष में आरोपित है-जो कला, काल, नियति, राग और विद्यारूपी है, वह बिना संवित् से सम्भव नहीं। लेकिन संवित् तो अखण्ड है, वह कैसे संकोच के कारण स्वातन्त्र्य शक्ति रूपी माया के बिना, संकोच का कारण रूपी स्वातन्त्र्य संकोच के अव- भासना तारतम्यशील है- अर्थात् यह पहले ईषत् असंकोचित, असंकोचित, ईषत् विकासी, विकस्वररूप के बिना, फिर यह भी परिपूर्ण प्रकाशमय