तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअब तत्त्वाध्वा का निरूपण किया जाता है यह जो स्वातंत्र्यशक्ति के विस्तार रूपी भुवन समूह की बातें कही गयी हैं जिसके अन्तर्गत रूप में अनन्त और विचित्र भोक्ता और भोग्य विषय हैं, उन सब में अनुस्यूत जो महाप्रकाश हैं वही महासामान्य¹ के सदृश परमशिव वर्तमान हैं। लेकिन जो कतिपय भेदविशिष्ट विषयों में अनुगत है वह तत्त्व कहलाता है।² जैसे पृथिवी धृति, कठिनता और स्थूलतारूप धर्म से युक्त है जो कालाग्नि से वीरभद्र तक भुवनों के पति द्वारा अधिष्ठित समस्त ब्रह्माण्डों में अनुगत धर्म हैं। इन तत्त्वों का कार्य- कारणभाव प्रदर्शित किया जा रहा है। यह दो प्रकार हैं—पारमार्थिक और कल्पित।³ १. संसार के सभी घटों में जैसे घटत्व रूप सामान्य धर्म स्थित है उसी प्रकार द्रव्यत्व रूप सामान्य धर्म घटत्व से भी व्यापक है, वह केवल घटों में ही नहीं सभी द्रव्यों में अनुस्यूत है। परमशिव भी उसी प्रकार सर्वत्र वर्तमान हैं, इसलिए उन्हें महासामान्य के सदृश कहा गया है। परमेश्वर प्रकाश- रूपी है उन्हीं के प्रकाश से विश्व की सभी वस्तुएँ प्रकाशमान हैं, इसलिए उन्हें सामान्य कहा गया है। २. धृति, काठिन्यादि धर्म केवल पृथ्वी में पाये जाते हैं, इसलिए इन धर्मों को जहाँ तक पाये जाते हैं, वहाँ तक पृथ्वी तत्त्व का विस्तार है। ३. लौकिक दृष्टि से सृष्टि आदि के रूप में जो कुछ प्रतीत होते हैं वे सब स्वतन्त्रप्रकाश - स्वरूप परमेश्वर का ही खेल है, इसलिए जिसे हम सृष्टि के रूप में देखते हैं, वह वस्तुतः स्वरूप का ही अभिन्न रूप है और जो संहार रूप में प्रतीत होता है वह वस्तुतः स्वरूपविश्राम का रूप है। कोई भी ऐसी स्थिति नहीं है जो स्वरूप से अतिरिक्त है, इसलिए काल्पनिक कार्यकारणभाव कोई वास्तविक स्थिति नहीं है। यद्यपि वास्तविक स्थिति इस प्रकार है तो भी मायिक स्थिति की व्याख्या के लिए काल्पनिक कार्य- कारणभाव स्वीकृत है। इस प्रकार कार्यकारणभाव नियति नियन्त्रित है ऐसा मानना पड़ता है।