तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ८ से सब प्रकार कर्म के नाश होने पर माया और पुरुष में विवेक उत्पन्न होता है, जिसके फलस्वरूप माया के ऊपर भूमि में विज्ञानाकल जीव स्थित रहते हैं, वे कभी माया से निम्न भूमि में नहीं जाते । इसी प्रकार जिसको कला और पुरुष में विवेक उत्पन्न हुआ है वह कला के ऊर्ध्व भूमि में रहता है । जिसे प्रकृति पुरुष विवेक हुआ है वह प्रधान से निम्नभूमि में नहीं जाता है । मल और पुरुषमें विवेक सम्पन्न होने पर शिवसमानता आती है, पुरुष की पूर्णता सम्बन्धी साक्षात्कार होने पर शिवत्व ही है । अतः कलातत्त्व ही किंचित् कर्तृत्व का आधान करनेवाला है, लेकिन जो अज्ञान है उसमें कर्तृत्व नहीं आ सकता है, अतः किंचित् ज्ञानदायिनी अशुद्ध विद्या जो कला से उत्पन्न हुई, वही विद्या बुद्धि की ओर देखती है और उसमें स्थित सुख आदि को विवेक पूर्वक ग्रहण करती है, क्यों कि बुद्धि गुणों से संकीर्ण होने के कारण बुद्धि में प्रतिबिम्बित वस्तुओं को एक दूसरे से विविक्त रूप में ग्रहण नहीं कर सकती है । इसलिए बुद्धि में प्रतिबिम्बित भाव समूह का विवेचन विद्या के द्वारा होता है, किंचित् कर्तृत्व के किंचित् अंश की सिद्धि के लिए किसी विशेष विषय सम्बन्धी कर्तृत्व के अर्थ में इसका तात्पर्य पर्यवसित होता है, किसी विशेष विषयक कर्तृत्व का होना रागतत्त्व का कार्य है । किसी विशेष विषयक कार्य तो अवैराग्य से ही सम्भव हो सकता है—ऐसी आपत्ति के उत्तर में कहा जाता है कि अवैराग्य युक्त जीवों में भी राग का अभाव दिखलाई पड़ता है,—और वैराग्य रहने पर भी धर्म आदि में अनुराग दिखलाई पड़ता है । भोजन के द्वारा तृप्त पुरुष में अवैराग्य का अभाव ( वैराग्य ) रहने पर भी हृदय में राग का अभाव नहीं रहता है । राग के अभाव होने पर अवैराग्य की अनुत्पत्ति का प्रसंग होगा। काल तो कार्यों का कलन करता हुआ उस कलना के द्वारा कर्तृत्व में परिच्छिन्नता लाता है । 'क्वचित्' इस अंश में समानता रहने पर भी इसी विषय में ही कर्तृत्व है इस प्रकार का होना नियति का कार्य है । कार्यकारणभाव में भी नियति का ही व्यापार है । अतः कला से इन चारों की उत्पत्ति हुई है । किसी वस्तु इस समय जानकर उस विषय में अनुरागी बनकर करता हूँ—इस प्रकार जो चैतन्य शरीररूपी पुर्यष्टक में स्थित है वह पशु कहलाता है । यह जो मायादिषट्क है उसे छः कंचुक कहते हैं । क्यों कि संवित् ( चैतन्य ) के माया के द्वारा आवरण डाले जाने पर उसके ऊपर कला आदि की स्थिति कंचुक ( आवरण ) के समान होती है ।