तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआ. ८ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ८७ इस प्रकार से देखने पर माया का कार्य जो किंचित् कर्तृत्व है उसमें किंचित् रूपी विशेषण विशिष्ट कर्तृत्वरूपी जो विशेष्य है उसमें जो कला¹ काम करती है वह विद्या आदि तत्त्वों को जननी (कारण) है—ऐसा इसका निरूपण हुआ है। अब इसका विशेषणरूपी जो भाग (अंश) है जिसका किंचित् शब्द से उल्लेख हुआ है वह ज्ञेय तथा कार्यरूप है। जब वही कला उसको अपने स्वरूप से अलग कर देती है तब वह सुख दुःख मोहात्मक होकर और सभी भोग्य पदार्थों के अनुगामी बनकर एक सामान्य रूप धारण कर लेती है और जिससे प्रकृतितत्त्व की उत्पत्ति होती है जिसका दूसरा रूप उन गुणों का साम्यरूप है—इस प्रकार से भोक्तारूप और भोग्य उभय एक ही साथ कलातत्त्व के अधीन होकर उत्पन्न होते हैं। इस विषय में इनकी सृष्टि वास्तव में बिना क्रम² से होती है—ऐसा कहा १. जब सृष्टि की धारा प्रवर्तित होती है तब जो जीव उस धारा में पतित हो जाता है उस समय उसके सम्मुख कोई क्रम प्रतिभात नहीं होता है, लेकिन योगी के साधनमार्ग में चलते समय क्रम अवश्य देखने को आता है। यह जानना उचित है कि सृष्टि युगपत् होती है। किसी-किसी शास्त्र में नियति के बाद काल का उल्लेख हुआ है, लेकिन यहाँ नियति का उल्लेख काल के अनन्तर हुआ है क्योंकि कार्यकारण सम्बन्धी नियम का जो व्यापार है अर्थात् कारण जो कार्य के पूर्वगामी है और कार्य जो कारण के बाद आने वाले हैं, बिना काल के अवच्छेद से कैसे सम्भव हो सकता है, इसलिए काल का उल्लेख नियति के पहले हुआ है। माया आदि कंचुक षट्क के द्वारा जो प्रमाता संकुचित हो जाता है वह 'विदि क्रिया' का कर्ता है, आगमों में उसे अणु कहते हैं। यहों पच्चीसवां तत्त्व पुरुष है। २ यद्यपि पुरुष में कर्तृत्व अनवच्छिन्न है लेकिन उस कर्तृत्व में किञ्चित् विशेषण रहने के कारण उसकी कर्तृत्वशक्ति सीमित हो जाती है और किसी वेद्य सम्बन्धी कर्तृत्व में वह पर्यवसित होती है। यह जो वेद्य है वह कोई विशिष्ट वेद्य नहीं अपितु सामान्य वेद्यात्मक प्रधानरूपी तत्त्व है। कलातत्त्व उस भोग्यरूपी तत्त्व को बाहर प्रकट कर देती है। कला के कारण ही एक ओर अणुरूपी भोक्ता और दूसरी ओर भोग्यरूपी प्रधान का जन्म होता है। अद्वय सिद्धान्त के अनुसार भोक्ता ही भोग्य रूप में स्थित है लेकिन माया के कारण भेदभाव का उदय होता है।