तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८८ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ८ गया है, लेकिन क्रम का भी अवभासन भी है—यह भी कहा गया है। यह क्रम विद्या और राग आदि में विचित्र प्रकार देखा गया है जैसे कोई जीव किसी वस्तु से अनुरक्त होकर बाद में उसे जानता है और कोई पहले किसी वस्तु को जानकर बाद में अनुरक्त होता है। इसलिए विद्या राग आदि का भिन्न प्रकार क्रमनिरूपण रौरव आदि शास्त्रों में जो कहा गया है उसमें कोई विरोध हुआ ऐसा नहीं समझना चाहिए। अतः जो भोग्यसामान्य १ है वह प्रधान ही है और जो प्रक्षोभ है वह गुणतत्त्व है। इसमें वही सुख है जहाँ भोग्यरूप प्रकाशात्मक सत्त्व उपस्थित है, दुःख प्रकाश तथा अप्रकाश का आन्दोलनात्मक है अतः यह रजसरूप और क्रियात्मक है, मोह तमसात्मक है जहाँ प्रकाश का अभाव है। ये तीनों वस्तुतः भोग्यरूप हैं। अतः क्षुब्ध प्रधान से अन्य कार्यों की उत्पत्ति होती है। अक्षुब्ध प्रकृति से नहीं। अव्यक्त और महत् के बीच में क्षोभ अवश्य ही मानना पड़ता है—इससे सांख्य दृष्टि से अज्ञात पृथग्रूप गुणतत्त्व २ है। प्रकृति में यह क्षोभ तत्त्व के अधिपति ईश्वर के अधिष्ठान से उत्पन्न होता है, नहीं तो किसी नियत पुरुष के प्रकृति की प्रवृत्ति सिद्ध नहीं होती। इसके अनन्तर (क्षोभ के अनन्तर) गुणतत्त्व से बुद्धितत्त्व उत्पन्न होता है १. बुद्धि के ऊपर तथा प्रकृति के नीचे गुणतत्त्व का स्थान है। प्रकृति गुणों की साम्यावस्था का नाम है। उस स्थिति में गुणों में किसी प्रकार क्षोभ नहीं रहता। जब तत्त्वाधिष्ठाता ईश्वरेच्छा से गुणों में वैषम्य का उदय होता है तब उसे क्षोभ कहते हैं। प्रकृति का जो क्षुब्धरूप है वही गुणतत्त्व है। यह जानने योग्य बात है कि प्रकृति के दो रूप हैं, एक उसकी साम्यावस्था है और दूसरी वैषम्यावस्था है। गुणतत्त्व प्रकृति से भिन्न कोई तत्त्व नहीं है। संसार की प्रवृत्ति क्षुब्ध गुणतत्त्व से होती है अक्षुब्ध प्रकृति से नहीं, जिस पुरुष में भोगलिप्सा समाप्त हो गयी है ईश्वरेच्छा से प्रकृति में उसके लिए क्षोभ उत्पन्न नहीं होता है, लेकिन इसके विपरीत भोगेच्छु के लिए श्रीकण्ठनाथ प्रकृति को क्षुब्ध करते हैं। इसलिए मुक्त पुरुष के लिए ईश्वर प्रकृति में कोई विकार उत्पन्न नहीं करते हैं। २. बुद्धि आत्मा रूपी प्रकाश के प्रतिबिम्ब का आधार है। वह एक ओर बोध का प्रतिबिम्ब धारण करती है, दूसरी ओर विषयों का। पुरुषरूपी प्रकाश का प्रतिबिम्ब धारण करने के कारण बुद्धि जड़ होती हुई भी विषयों का प्रकाशन कर सकती है।