भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

पृष्ठ 170, कुल 294 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 170

आ. ८ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ८९ जिसमें पुरुषरूपी प्रकाश और विषय का प्रतिबिम्ब अर्पित होता है। बुद्धितत्त्व¹ से अहंकार उत्पन्न होता है। जिससे बुद्धि में प्रतिबिम्बित वेद्य वस्तुओंके सम्पर्क से पुरुषरूपी प्रकाश मलिन होकर शुक्ति में रजत के अभिमान के सदृश अनात्मा में आत्माभिमान रूपी अहंकार का उदय होता है।² इसलिए 'कार' शब्द से अहंकार कार्यवस्तु है—ऐसा कहा गया है। यह सिद्धान्त सांख्य मत के अनुसार ठीक नहीं लगता हैं, क्योंकि वह सिद्धान्त आत्मा की 'अहं विमर्शमयता' का अंगीकार नहीं करता है, लेकिन हमलोग उसकी कर्तृता भी स्वीकार करते हैं अर्थात् आत्मा कर्ता है ऐसा मानते हैं। इस शुद्ध विमर्श का कोई प्रतियोगी नहीं है, यह स्वात्मचमत्कार रूप अहं है। यह हुआ अहंकार का इन्द्रियात्मक स्वरूप³ उसकी प्रकृतिरूपता १. बुद्धिवृत्ति रूपी प्रकाश में 'मैं यह करता हूँ, यह जानता हूँ' इस प्रकार जो अभिमान है अहंकार उसी स्वरूप का है। अनात्मवस्तु में आत्माभिमान के अलावा इसका एक असाधारण कार्य भी है। अहंकार ही अपने संरम्भ के बल से प्राणों का प्रेरक है; जब उसकी संरम्भरूपी प्रेरणा की समाप्ति हो जाती है तब जीवों की मृत्यु होती है। २. अहंकार के सात्त्विक भाग से मन और पाँच ज्ञानेन्द्रियों की उत्पत्ति होती है। मन में एक विशेषता यह है कि वह सब इन्द्रियों के विषयों से सम्बन्ध रखता है, किन्तु इन्द्रियाँ नियत विषयक हैं—इसका कारण क्या है, इसके अनुसन्धान करने पर ज्ञात होता है कि अहंकार मन के कारण होते समय तन्मात्राओं के अविशिष्ट कर्ता है, लेकिन ज्ञानेन्द्रिय आदि के जन्म में वह नियतरूप है। इसलिए इन्द्रियाँ नियत विषयक हैं, जैसे श्रोत्र शब्द का ही ग्रहण करता है, स्पर्श का नहीं, लेकिन मन सर्वविषयक है क्योंकि मन अहंकार के सात्त्विक अंश से उत्पन्न होकर भी अनियतविषयक या सर्व- विषयक है। ३. बुद्धि, अहंकार और मन अन्तःकरण हैं जिसके अध्यवसाय, अभिमान और संकल्प आदि वृत्तियाँ हैं। प्राण को अन्तःकरण नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि वह जड़ है लेकिन बुद्धि आदि जड़ होने पर भी उनमें चेतन का सीधा सम्पर्क है क्योंकि कारणरूप अहंकार में प्राणों की प्रेरकता है। यह बिना इच्छा से और इच्छा भी बोध या ज्ञान के बिना होना सम्भव नहीं है—ये सभी गुण बुद्धि अहंकार और मन में वर्तमान हैं।