भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

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पृष्ठ 171

९० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ८ सत्त्व आदि के भेद से तीन प्रकार हैं जिसमें सात्त्विक अंश वह है जिससे मन और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ उत्पन्न होते हैं, उसमें मन जो कार्य है उसका जनक या कर्ता अहंकार है जिसमें शब्दतन्मात्रा को उत्पन्न करने का सामर्थ्य है। श्रोत्र का कारण होता हुआ वही शब्दजनक है, इस प्रकार घ्राणेन्द्रिय में वही गन्धजनकता की शक्ति रखता है। इन्द्रियों की भौतिकता युक्तिसिद्ध नहीं है—मैं सुनता हूँ इस प्रकार 'मैं' का अनुगम रहने के कारण इन्द्रियाँ स्पष्टतया आहंकारिक हैं और वे ( इन्द्रियाँ ) करण होने के नाते इनके कर्ता के साथ सम्बन्ध होना अवश्य चाहिए, नहीं तो दूसरे करण के योग स्वीकार करने पर अनवस्था आ जाती है। अहंकार ही कर्ता और करणों में कर्ता का अंश है, इसलिए पुरुष के दो मुख्य करण हैं—ज्ञानरूप अंश में विद्या और क्रिया में कला है क्योंकि अन्धा और पंगु ( लंगड़े ) में अहन्तारूप ज्ञान ( रूपज्ञान ) और क्रिया ( गमन क्रिया ) अभाव नहीं रहता। तन्मात्राओं की बलवत्ता होने पर सात्त्विक अहंकार में जो विशेषता आती है उससे पाँच कर्मेन्द्रियों का उदय होता है। 'मैं चलता हूँ' इस प्रकार अहंकार से युक्त और कार्य करने में समर्थ इन्द्रिय ही पादेन्द्रिय है, उसका मुख्य अधिष्ठान बाहरी पैर, अन्यत्र भी वही इन्द्रिय है, क्योंकि पैर से रहित पुरुष में भी गति का अभाव नहीं रहता है। यह कहना उचित नहीं कि उस हेतु से कर्तव्य का सांकर्य होगा, क्योंकि क्रिया मात्र ही करण का कार्य है, गमन आदि का मुख्यरूप क्रिया है, रूप आदि का बोध की क्रियारूपता नहीं है, वैशेषिक शास्त्र में वे गुण कहते हैं, इसलिए कर्मेन्द्रियवर्ग अवश्य ही मानना चाहिए। उनकी संख्या पाँच हैं क्योंकि अनुसन्धान पाँच ही है। जब बाहर त्याग की अनुसन्धि अथवा ग्रहण की, या त्याग और ग्रहण दोनों की, अथवा दोनों के अभाव ( अर्थात् जहाँ त्याग और ग्रहण दोनों न हों ) रहकर स्वरूप में विश्राम के लिए हो तो क्रमशः पायु, पाणि पाद और उपस्थ आदि इन्द्रियाँ कार्य करती हैं। जब भीतर ही भीतर प्राणों के आश्रयण कर कर्म की अनुसन्धि होती है तब वागिन्द्रिय कार्य करता है। इसलिए इन्द्रिय के अधिष्ठान ( अर्थात् पादेन्द्रिय ) हाथ में होने पर उससे जो गमन क्रिया होती है वह भी पादेन्द्रिय का ही कार्य है ऐसा मानना पड़ता है, अतः कर्म अनन्त प्रकार के होने पर भी इन्द्रियाँ अनन्त प्रकार के नहीं होती हैं। इतने दूर तक राजस गुणका सम्बन्ध है—ऐसा कहा जाता है। दूसरे सिद्धान्त के अनुसार रजस् से मन उत्पन्न होता है ऐसा