भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

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पृष्ठ 172

आ. ८ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ९१ कहा जाता है। फिर दूसरे लोग सात्त्विक गुण से मन और रजस् से इन्द्रियाँ उत्पन्न होते हैं ऐसा कहते हैं। भोक्तारूप के गुणभाव और तमस् प्रधान अहंकार से पाँच तन्मात्राएँ जिनका एकमात्र स्वरूप वेद्यमय है, उत्पन्न होते हैं। विशेष विशेष शब्दों के जो क्षुब्धरूप हैं उनके पूर्वगामी सामान्यात्मक अविशिष्ट जो स्वरूप है वही शब्द तन्मात्रा है। इसी प्रकार गन्ध तक तन्मात्राओं के सम्बन्ध में कहना पड़ता है। शब्दतन्मात्रा के क्षुब्ध होने से अर्थात् वह जब कार्यजनन के प्रति उन्मुख होती है तब अवकाशदानरूप व्यापार करने वाले आकाश की उत्पत्ति होता है—क्योंकि शब्द वाच्य वस्तुओं के लिए स्थानरूप अवकाश देने में सामर्थ्य रखता है। शब्द- तन्मात्रा जब क्षुब्ध होती है तब वायु की उत्पत्ति होती है—शब्द भी उसके सहचारी है वायु का आकाश से कभी वियोग नहीं होता। रूप के क्षुब्ध होने पर तेज का जन्म होता है अन्य दो गुण (शब्द और स्पर्श) पहले जैसे रहते हैं। क्षुब्ध रस तन्मात्रा से जल तत्त्व का जन्म होता है शब्द, स्पर्श, रूप ये तीन पहले जैसे हैं। गन्ध तन्मात्रा के क्षुब्ध होने से पृथिवी तत्त्व का उदय होता है, अन्य चार गुण पहले जैसे हैं। कोई-कोई शब्द और स्पर्श से वायु—इस क्रम से पाँचों तन्मात्राओं से पृथिवी का उदय मानते हैं। गुणों का समूह ही पृथिवी हैं, गुणों के समष्टि के अतिरिक्त कोई गुणी नहीं है। इन तत्त्व समूहों में ऊर्ध्व ऊर्ध्व गुण व्यापक है निकृष्ट गुण व्याप्य है। जिसके बिना अन्य गुणों की उत्पत्ति नहीं हो सकती है उसे ही गुणों का उत्कर्ष समझना चाहिए। अतः पृथवीतत्त्व शिवतत्त्व से लेकर जलतत्त्व के द्वारा व्याप्त है, इसी प्रकार जल अग्नितत्त्व के द्वारा व्याप्त है—इस प्रकार शक्तितत्त्व तक स्थिति है। × × × भूतसमूह, तन्मात्राएँ, इन्द्रियाँ, प्रकृति, कंचुक से आवृत्त पुरुष, विद्या से शक्तितत्त्व शुद्धतत्त्व यह समग्ररूप संवित्स्पी सागर की लहरियाँ हैं— जो इस प्रकार से प्रसृत हुआ है। इति श्री अभिनवगुप्ताचार्य के द्वारा विरचित तन्त्रसार का अष्टम आह्निक