भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

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पृष्ठ 182

आ. ९ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १०१ त्रुटिवाली है, उन्मिषितता ये छः त्रुटियाँ हैं। परन्तु स्वकार्यकर्तृता जो ग्राहक रूप है अतः इसकी गिनती नहीं होती है। इसलिए विचारशील विद्वान जो गुरु के उपदेश के अनुसार चलते हैं सब जगह (अर्थात् धरा से प्रकृति तत्त्व तक सभी जगह) इस प्रकार पञ्चदशात्मकता का विवेचन करते हैं। विकल्पों की न्यूनता आने पर त्रुटियों की न्यूनता आती है जैसे सुख के अनुभव के समय दुःख के विस्मरण के समान विकल्प का भी विश्राम अविकल्प स्थिति तक हो जाता है। विकल्प की विश्रान्ति के द्वारा लोग उस अहन्तामयी स्थिति जो अहन्ता द्वारा आवृत इदं-भाव-रूप विकल्प की प्रसरभूमि निर्विकल्प स्थिति रूपी विमर्श भूमि है जो अभी अप्रकाशित है ऐसे मानते हैं। दुःखरूपी स्थिति को सुख में विश्रान्त होने के समान विकल्प के ह्रास के द्वारा उसका प्रकाशन होता है, इसलिए ग्राह्य और ग्राहकों में जो सम्बन्ध है उसकी ओर अवधानता आवश्यक है—ऐसा ही श्रीअभिनवगुप्त के गुरुओं का अभिमत है। पञ्चदशात्मकता की स्थिति इस प्रकार होनेपर स्फुट इदन्तात्मक भेद की न्यूनता दो-दो के क्रम से जैसे-जैसे होती रहती है और अन्त में दो त्रुटिवाले शिवावेश सम्पन्न होता है। उन दो त्रुटियों में पहली त्रुटि सब प्रकार से परिपूर्ण है और दूसरी त्रुटि सब प्रकार ज्ञान और करणों से परिपूर्ण है इस प्रकार अभ्यास से वह सर्वज्ञत्व और सर्वकर्तृत्व के प्रदान करनेवाली बन जाती है—लेकिन आद्य त्रुटि ऐसी नहीं है। श्रीकल्लट आचार्य ने इसलिए कहा है—‘त्रुटिपात इति’। यहाँ पात शब्द से वही भगवती श्रीमत्काली, मातृसद्भाव, भैरव, प्रतिभा को समझना चाहिए। अब इस रहस्य को खोलना उचित नहीं लगता है। इस प्रकार मन्त्रमहेश्वर सम्बन्धी त्रुटि से आरम्भ कर अन्य-अन्य त्रुटियों के अभ्यास से भिन्न-भिन्न प्रकार की सिद्धियाँ आती हैं। इसके उपरान्त इसीमें जाग्रत् आदि स्थितियों का निरूपण हो रहा है। उसमें वेद्य के और उसके सम्बन्धी संवित् की जो विचित्रता है उसके परस्पर की अपेक्षा से जिन अवस्थाएँ हैं वही जाग्रत् आदि हैं। यह न केवल वेद्य और संवित् की अवस्था नहीं, न तो यह एक दूसरे से पृथक् भी नहीं। जब अधिष्ठेय (आधार) के रूप में बाह्य वस्तु के रूप में इसकी प्रतीति होती है तब जाग्रत स्थिति मेय, माता और मान (प्रमाण) के रूप में प्रकट होती है। जब उसी स्थिति में अधिष्ठान (प्रमाण) के रूप में उसका भान