तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०२ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ९ अर्थात् संकल्प का उदय होता है तब उसे स्वप्नावस्था कहते हैं। जब उसी स्थिति में प्रमाता के साथ एकात्मता अर्थात् भावी कार्यों के बीज के रूप में भान होता है तब वही सुषुप्तावस्था है। यही तीन प्रमेय, प्रमाण और प्रमाता रूप अवस्थाएँ जाग्रदादि के भेद से चार प्रकार स्थितियों से प्राप्त करती हैं—ऐसा कहा गया है। जब प्रमाता के स्वरूप में विश्रान्त प्रमाता की पूर्णता के प्रति जो आभिमुख्य है उस उन्मुखता के द्वारा पूर्णता-उन्मुखीन जो भान है तब वही तुर्यावस्था है। इसका रूप 'मैं इस रूप को दृष्टि के द्वारा इस प्रकार प्रमेय, प्रमाण और प्रमाता आदि तीन रूपों को अतिक्रमण कर देखता हूँ' इस प्रकार उपायहीन (अनुपायिक) प्रमातृता के रूप में भासित होता है जिसका सार ही स्वतन्त्रता है जो नैकट्य, मध्यत्व और दूरत्व के द्वारा अवस्थाओं में प्रमाणता और प्रमेयता रूप धर्म का आधान करती है और तीन अवस्थाओं का अनुग्राहक बन जाती है और तीन प्रकार बन जाती है। ये चार अवस्थाएँ योगिगण पिण्डस्थ, पदस्थ, रूपस्थ, रूपातीत शब्दों के द्वारा वर्णन करते हैं। ज्ञानी पुरुषगण इन्हें सर्वतोभद्र, व्याप्ति, महा- व्याप्ति, प्रचय आदि शब्दों से वर्णना करते हैं। इन शब्दों की सार्थकता का उल्लेख तन्त्रालोक और मालिनीविजयवार्तिक में हुआ है। सबमें अनुस्यूत जो पूर्णरूप है और जो तुर्यातीत और सबके अतीत स्वरूप है उसे ही महाप्रचय के रूप में ज्ञानियों के द्वारा निरूपण हुआ हैं। अपितु जिसका स्वरूप जब स्फुट, स्थिर, अनुबन्धी (एक दूसरे से सम्बन्धित) रहता है वह जाग्रत् है। उसका विपरीत जो स्वरूप है वह स्वप्न है। प्रलयाकल का जो भोग है और जो वस्तु के बोध का अभाव रूप है वह सुषुप्त है। विज्ञानाकल आत्मा का जो भोग है तथा भोग्य वस्तु के साथ अभिन्नता का आपादन करता है वही तुर्य है और वही मन्त्र आदि अधिकारी पुरुषों का भोग है। सभी भावों की शिव के साथ जो अभिन्नता है वह तुर्यातीत है जो सबकी अतीत स्थिति है। उसमें स्वरूपसकल १. प्रलयाकल, २. विज्ञानाकल, ३. मन्त्र मन्त्रेश्वर मन्त्रमहेश्वर, ४ शिव इनके पन्द्रह भेदों में पाँच अवस्थाएँ हैं। स्वरूप, प्रलयाकल आदि के क्रम से तेरह भेद हैं। स्वरूप, विज्ञानाकल की शक्ति, विज्ञानाकल आदि के क्रम से ग्यारह भेद हैं। स्वरूप, मन्त्र, मन्त्रेश्वर, मन्त्रमहेश्वर, शिव आदि के क्रम से नौ भेद हैं। स्वरूप, मन्त्रेश्वर, मन्त्रमहेश्वर, शक्ति और शिव