तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआ. ९ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १०३ आदि के क्रम से सात भेद हैं । स्वरूप, महेशशक्ति, महेश, शक्ति और शिव ये पाँच भेद हैं । स्वरूप, क्रियाशक्ति, ज्ञानशक्ति, इच्छाशक्ति और शिव तीन भेदों में हैं। शिवतत्त्व में भिन्नता का अभाव है इसलिए उसमें क्रिया, ज्ञान, इच्छा, आनन्द और चित् की कल्पना से ज्ञानी तथा योगीगण पञ्चरूपता का अङ्गीकार करते हैं । पृथ्वी आदि तत्त्वों के समूहों में प्रमाता का वास्तविक स्वरूप संवित् में विश्रान्त न रहकर विचित्र तथा विविध रूपों में भासित होता है लेकिन उनका जो प्रमातृरूप निखिल वेद्यसमूहों में विविध क्रमरूपी है वह निर्विकल्प अहन्तात्मक है उसका सार स्वातन्त्र्य परामर्शमय है। आप इस भूमि में स्थित हों और अपना आत्मस्वरूप प्राप्त करें । इति श्री अभिनवगुप्त रचित तन्त्रसार का नवम आह्निक ।