भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

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पृष्ठ 189

१०८ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १० करनेवाली है।१ अतः उसकी संख्या भी दस हैं। करणभाव जहाँ गौण होकर कर्तृभाव मुख्य होता है वहाँ भी उसकी संख्या पाँच है। शुद्ध कर्तृभाव आ जाने से उसकी संख्या पाँच हैं। जहाँ सब प्रकार भेदों का विगलन हो चुका है और शुद्ध स्वरूप विकासोन्मुख हो जाता है तो उसकी संख्या है पाँच। सब प्रकार अवच्छेद जहाँ नहीं रहता है वही शिवतत्त्व है जो छत्तीसवाँ तत्त्व है। जब उसके सम्बन्ध में उपदेश किया जाता है, उसकी भावना की जाती है और जो सब का आधारभूत है, तब वही सैतीसवाँ२ तत्त्व है। अगर उसके सम्बन्ध में भी भावना की जाती है तो वही अड़तीसवाँ तत्त्व बनता है। इससे अनवस्था का दोष नहीं आता है। जिसके सम्बन्ध में यह भावना होती है वह स्वरूपतः अनवच्छिन्न तथा स्वतंत्रस्वभाव हैं, जब उसे भी वेद्यरूप में ग्रहण किया जाता है तब वही सैतीसवाँमें ही अन्ततोगत्या पर्यवसित होता है। छत्तीसवाँ तत्त्व को १. सभी अध्वाएँ शक्ति का ही स्पन्दनरूप हैं लेकिन वे पूर्णप्रकाश से अभिन्न हैं और उन्हीं की इच्छा से उनसे अभिन्न होते हुए भी बाहर भिन्न रूप में अवभासित होती हैं। मन्त्र आदि अध्वाएँ प्रमातृभागगत हैं ऐसा पहले कहा गया है, इसलिए प्रमाता का स्वतन्त्रभाव उनमें वर्तमान है, इसलिए जब सभी वाच्य वस्तुएँ चिद्विमर्श के द्वारा आत्मस्वरूप में विगलित की जाती हैं तब स्वतंत्रतारूपी ज्ञान और क्रियात्मक मननरूपी परामर्श का उदय होता हैं, और इसके फलस्वरूप सभी इदन्ताओं का अहन्ता में विश्राम आ जाता है। यही संक्षेप में मन्त्रों की मननधर्मता और त्राणधर्मता है। २. संविद् की स्फुरणधारा दो प्रकार हैं एक उसकी क्षुब्धधारा और दूसरी अक्षुब्ध धारा है। प्रमाता में विश्रान्त वर्णों को संक्षुब्ध कर उनसे पदों की निष्पत्ति होती है और पदों से अर्थों के अधिगम होने पर क्षोभ का उपशमन होता है। पद संजल्पनात्मक है, जो भोगरूप विषयों का रूप धारण करना, विभिन्न प्रकार की प्रतीतियों की उत्पत्ति के द्वारा सीमित प्रमाताओं के हृदय में सुख या दुःख का अनुभव करवाना ही वर्णों का कार्य है। प्रमाण के रूप में वर्तमान रहकर प्रमेयों का रूप धारण करना ही कलाध्वा है। शुद्ध प्रमेय रूपी अध्वाएँ दो हैं, एक तत्त्वरूप है और दूसरा भुवन है।