भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

पृष्ठ 190, कुल 294 में से

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पृष्ठ 190

आ. १० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १०९ सब तत्त्व से उत्तीर्ण तथा काल्पनिक अवच्छिन्नता ( भावना के द्वारा ) होने पर पंचकलाविधि सम्पन्न होती है ( पृथ्वी से ) विज्ञानाकल तक आत्मकला व्याप्त है, ईश्वर तक विद्याकला और शेष शिवकला द्वारा व्याप्त है—यही त्रितत्त्व विधि है।१ इसी क्रम से नवतत्त्व२ विधि के सम्बन्ध में कल्पना करनी चाहिए। प्रमेयवर्ग में अनुगामी स्थूल, सूक्ष्म और परस्वरूप भुवन, तत्त्व और कला ये तीन अध्वाओं के भेद हैं।३ प्रमाता में विश्रान्त स्वरूप भी उसी प्रकार तीन प्रकार है।४ १. नौ तत्त्वों में प्रकृति, पुरुष, नियति, काल, माया, शुद्धविद्या, ईश्वर, सदा- शिव और शिव अन्तर्भूत हैं। २. निवृत्तिकला के अन्तर्गत तत्त्व पृथ्वी है। उस कला में १६ भुवन है, पद वर्ण और मन्त्रों की संख्या एक-एक हैं। जल तत्त्व से प्रकृति तत्त्व तक तेईस तत्त्व में ह से ट तक वर्ण हैं, भुवनों की संख्या छप्पन है, मंत्र और पदों की संख्या पाँच-पाँच हैं। जिस कला के द्वारा ये तत्त्व व्याप्त है उसका नाम प्रतिष्ठा है। विद्याकला के द्वारा व्याप्त तत्त्व पुरुष से माया तक तत्त्व समूह हैं, इनकी संख्या सात हैं। ञ से घ तक वर्ण इसके अन्तर्गत हैं, दो पद और दो मन्त्र हैं और भुवनों की संख्या अठाईस हैं। शान्तिकला में तत्त्व तीन, ग ख और क वर्ण हैं। पद और मंत्र एक, एक-एक है। शान्त्यतीत कला में तत्त्व शिव है जो शक्ति से अभिन्न है, वर्ण सोलह स्वर है। यहाँ भुवन नहीं है, मंत्र पद एक-एक है। ३. अद्वैत शैवसिद्धान्त के अनुसार तत्त्वों की संख्या छत्तीस हैं, उनमें कुछ प्रमेयकोटि के अन्तर्गत हैं, कुछ प्रमाण कोटि में और कुछ प्रमातारूपी कर्त्ता की कोटि में वर्तमान हैं। प्रमेय दो प्रकार हैं—एक स्थूल है और दूसरा उससे सूक्ष्म है। स्थूल प्रमेय पृथ्वी आदि भूतपंचक है और सूक्ष्म प्रमेय पाँच तन्मात्राएँ हैं। इसलिए प्रमेयों की संख्या दस हैं। ४. प्रमेयों की तरह करण भी दस हैं--कुछ स्थूल करण हैं जिन्हें कर्मेन्द्रिय कहते हैं। वाक्, पाणि, पाद, पायु और उपस्थ स्थूल करण हैं। सूक्ष्म करण ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। ज्ञानेन्द्रियाँ करणरूपी होने पर भी उनमें कर्तृभाव स्वल्पमात्रा में प्रतीत होता है। जहाँ करणभाव गौण होकर स्पष्टरूप से प्रतीयमान कर्तृभाव ( वास्तविक नहीं ) आ जाता है वहाँ उनकी संख्या पाँच हैं। इस वर्ग में मन, बुद्धि, अहंकार, प्रकृति और पुरुष अन्तर्गत हैं।

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