तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
DevanagariHindipublished294 पृष्ठ
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११० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १० प्रमाता में विश्रान्त स्वभाव इनका जब प्रमाणरूपता है तब उसे पदाध्वा कहते हैं। प्रमाण के क्षोभ की लहरें जब समाप्त होने जा रही है तो उस समय मन्त्ररूपी अध्वा बनती है। उस क्षोभ की शान्ति होने पर जब पूर्ण प्रमातृता आती है तब वर्णाध्वा है। वही वर्ण पूर्णस्वरूप है १ और उसमें अर्थात् स्वरूप में जब उसकी विश्रान्ति आती है तब उसकी स्वरूप प्राप्ति होती है, अतः एक ही स्वरूप छः प्रकार हैं ऐसा कहना यथार्थ ही है। पद, मन्त्र और वर्ण एक-एक है, भुवन की संख्या सोलह हैं, इस प्रकार धरातत्त्व में निवृत्ति कला काम करती है। अर्थात् निवृत्ति कला धरा की धारिका है, यहाँ वर्ण क्ष है। अग्नि तीन हैं, नयन दो हैं इसलिये तेईस तत्त्वों में अर्थात् जल से प्रकृति तक तत्त्वों में ह से ङ तक तेईस वर्ण हैं। रस छः हैं, शर पाँच हैं इसलिए भुवनों की संख्या छप्पन हैं। मन्त्र की संख्या पाँच है, पद भी पाँच हैं। कला आप्यायिनी है जिसका अन्य नाम प्रतिष्ठा है। पुरुष से माया तक तत्त्वों में ञ से घ तक मुनि अर्थात् सात वर्ण हैं। पद और मन्त्र पंचाक्षरात्मक है। वसु आठ, अक्षि दो हैं इसलिए अठाईस भुवन हैं और कला बोधिनी या विद्या है। अग्नि तीन हैं, इसलिए गखक ये तीन वर्ण हैं। तीन तत्त्व है, मन्त्र
शुद्ध कर्तृभाव जहाँ प्रतीत होता है वहाँ कला, विद्या, राग, नियति, काल ये पाँच हैं। माया आवरण करने वाली है लेकिन माया सब तत्त्वों की जो पारस्परिक विभिन्नताएँ हैं उन्हें मिटाकर उन पर एक परदा जैसा आवरण डाल देती है जिससे सब तत्त्वों में जो पारस्परिक भेद है वह तिरोहित हो जाता है। सृष्टिप्रक्रिया में उसी आवरण ( Screen ) पर चित्रों के समान तीस तत्त्वों का निर्माण होता है। संहारक्रम में जब वह आवरण हट जाता है तब शुद्ध प्रकाश धीरे-धीरे खोलने लगता है। १. शिवस्वरूप सब प्रकार अवच्छिन्नता से रहित है, लेकिन उनके सम्बन्ध में जब भावना की जाती है तब उनमें कुछ परिच्छिन्नता आ जाती है इस कारण सब प्रकार परिच्छिन्नता से शून्य जो उनका स्वरूप है वही सैतीसवाँ तत्त्व है।