भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

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आ. १० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १११ त्र्यक्षर और पद भो सैन्य = अक्षौहिणी अर्थात् अठारह भुवन हैं। इसमें उत्पूयिनी नाम की कला अर्थात् शान्ता नाम की कला हैं। सोलह वर्ण ( अ से अः तक ) । पद, वर्ण, मन्त्र एक-एक हैं। इसमें शान्त्यतीत कला व्यापृत है। ८ श्री अभिनवगुप्त नाम के आचार्य ने शिष्यों के लिए संक्षेप के कारण इन तीन आर्या का निर्माण किया। इति तंत्रसार के कलाध्वप्रकाशन नाम का दशम आह्निक । ८. छत्तीस तत्त्वों को तीन खण्डों में देखना ही त्रितत्त्वविधि है। आत्मकला पृथ्वी से विज्ञानाकल तक व्याप्त है, विद्याकला ईश्वर तक और शक्ति और शिवतत्त्व शिवकला द्वारा व्याप्त है। आत्मकला, विद्याकला और शिव- कला ये तीन कलाएँ हैं।