तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकादश आह्निक इतने दूर तक जो कुछ कहा गया है वह किसी के लिए साक्षात् रूप से कथित संक्षिप्त विधि के द्वारा अपवर्ग (मोक्ष) प्राप्ति का कारण बनता है, फिर किसी को आगे बतलायी जानेवाली दीक्षा के द्वारा इष्ट विषय की प्राप्ति होती है इसलिए दीक्षा आदि विषयों का उल्लेख होना चाहिए। अब उसमें (दीक्षा का) अधिकारी कौन है इस प्रश्न के निर्णय के लिए शक्तिपात¹ पर विचार किया जाता है। इस विषय में कुछ लोगों का विचार यह है कि ज्ञान के अभाव के कारण अज्ञानमूलक संसार का उदय होता है, अज्ञान के तिरोधान होने पर ज्ञान का उदय होता है जिसके फलस्वरूप शक्तिपात होता है²। ऐसे विचार करनेवाले को यह बताना होगा कि यथार्थ ज्ञान का उदय किस कारण से होता है। अगर कर्म से उसकी उत्पत्ति मानी जाती है तो कर्म के फल के सदृश उसकी भोग्यता का प्रसंग आ जाता है और भोग करनेवालों में शक्तिपात मानने पर अतिप्रसंग का दोष अवश्य आता है³। ईश्वर की इच्छा ही ज्ञानके उदय
१. जीव स्वभावतः शिव ही है, वही उसका स्वरूप है। जीव उस स्वरूप को किसी न किसी उपाय से प्राप्त कर लेते हैं। इन उपायों में कोई शीघ्रता से अथवा विलम्ब से उन्हें स्वरूपप्राप्ति के सहायक बन जाते हैं, अथवा उन उपायों में कुछ क्रम के बिना और कुछ सक्रम भाव से जीवों को अपने स्वरूप प्राप्त कराने में सहायक होते हैं। आचार्यों की परिभाषा के अनुसार इस उपाय को शक्तिपात कहते हैं। शक्तिपात भगवदनुग्रह का ही नामान्तर है। परमेश्वर के पाँच कृत्यों में अनुग्रह या कृपा एक है। उनके अन्य कृत्यों के समान अनुग्रह भी इन्हीं की इच्छा का खेल है। २. किन्हीं-किन्हीं का मत है कि शक्तिपात ज्ञान के उदय से होता है। वे कहते हैं कि ज्ञान के उदय होने पर अज्ञान की निवृत्ति होती है जिसके फल- स्वरूप शक्तिपात होता है। लेकिन यथार्थज्ञान किस प्रकार से उदित होता है इसका समाधान इससे नहीं होता। ३. कर्म को ज्ञान का कारण मानने पर ज्ञान को कर्म का फल मानना पड़ता है। इस अवस्था में ज्ञान और कर्मफल समानार्थक हो जाते हैं। अतः