भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

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पृष्ठ 197

११६ ] तन्त्रसार-अभिनव गुप्त [ आ. ११ का कारण है ऐसा मानने पर अन्योन्याश्रयरूप दोष¹ के कारण दोनों ही असिद्ध होते हैं। अपितु ईश्वर में राग आदि गुणों का प्रसंग आता है। दो विरुद्ध समबल कर्म जब एक दूसरे को फलोन्मुख होने से रोकते हैं तब कर्मसाम्य² होता है और उसी से शक्तिपात होता है, लेकिन ऐसा कहना उचित नहीं लगता क्योंकि कर्म स्वरूपतः क्रमिक होने के कारण युगपत् दो कर्मों का सहावस्थान नहीं होता है इसलिए दोनों में विरोध उत्पन्न नहीं होता। अगर दो कर्मों में विरोध मान भी लिया जाता है तो जो अविरुद्ध कर्म है उससे फल की उत्पत्ति स्वीकार करना पड़ता है, यदि अविरुद्ध कर्म की अप्रवृत्ति है अर्थात् फलोन्मुखता नहीं मानी जाती है तो उसी क्षण में देहपात का प्रसंग उठता है—इस आपत्ति के उत्तर में अगर कहा जाता है कि जन्म और आयु के निष्पादक कर्म ही प्रतिरुद्ध नहीं होते हैं अन्य भोग प्रदान करनेवाले कर्म ही केवल प्रतिरुद्ध रहते हैं—यह भी कहना ठीक नहीं है, क्योंकि भोग प्रदान करनेवाले कर्मों की वर्तमानता के काल में यदि शक्तिपात होता है तो भोगसम्पादक कर्मों से शक्ति का कौन-सा डर है ? अगर कहा जाय मल के परिपाक होनेपर शक्तिपात होता है तो प्रश्न

ज्ञानी को भी कर्मफलभोगो के रूप में ग्रहण करना पड़ता है। ज्ञान के उदय से शक्तिपात स्वीकार करने पर प्रकारान्तर से भोगों में ही शक्तिपात मानना पड़ता है। इसलिए अतिप्रसंग का दोष आ जाता है। १. ज्ञान के उदय से ईश्वरेच्छा के अनुमान और ईश्वरेच्छा के अनुमान से ज्ञानोदय इस प्रकार अन्योन्याश्रय रूप दोष आ जाता है। २. दो समान बलवाले कर्मों के पारस्परिक प्रतिबन्ध से कर्म का जो समभाव है वही कर्मसाम्य है। दो परस्पर विरोधी कर्म वे हैं जो एक दूसरे के फल को रोकते हैं जिससे किसी क्षण उनकी युगपत् प्रवृत्ति नहीं होती। लेकिन जो कर्म अविरुद्ध है वह फल प्रदान करता रहता है। अगर अविरुद्ध कर्म एक क्षण के लिए भी फल प्रदान नहीं करता है तो उसी क्षण देहपात हो जाना चाहिए। यदि कहा जाय कि जाति (जन्म) और आयु इन दो फलों के देनेवाले कर्म प्रतिबद्ध नहीं होता, केवल भोगप्रद कर्म ही प्रतिबद्ध होता है, तो प्रश्न यह होगा यदि जाति और आयुप्रद कर्म रहते हुए भी शक्तिपात होता है, तो भोगप्रद कर्म रहने पर शक्तिपात क्यों नहीं हो सकेगा यह प्रश्न रह जाता है।