तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआ. ११ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ११७ यह उठता है कि मलपरिपाक का स्वरूप क्या है ? उसका कारण भी कैसा है ? १ इस कथन के द्वारा वैराग्य, धर्मविशेष, विवेक, सत्संग, सत्वस्तु की प्राप्ति, देवपूजन आदि शक्तिपात के कारण हैं ऐसे विचार भी खण्डित हुए। अतः भेदवादियों का सब कथन युक्तिसिद्ध नहीं है। स्वतन्त्र परमेश्वराद्वयवाद में ये सभी युक्तियुक्त हैं और उपपन्न भी हैं। जैसे परमेश्वर अपने स्वरूप गोपन करने की इच्छा से स्वयं पशु जीव, पुद्गल अणु बन जाते हैं। देश और काल उनके स्वरूप में भेदरूपी विरोध का उत्पन्न नहीं करते हैं। उनके स्वरूप गोपनरूप स्थगन की निवृत्ति के द्वारा स्वरूप का उन्मोचन बिना किसी क्रम से अथवा क्रम के अवलम्बन के द्वारा वह अणु शक्तिपात का पात्र बन जाता है। परमेश्वर जिनका वास्तविक स्वरूप स्वतन्त्रता है वही शक्ति का पात करनेवाले हैं, अतः शक्तिपात सब प्रकार से निरपेक्ष है। और जिसका फल है स्वरूप का प्रकाशन। भोग के प्रति उत्सुक जीवों में शक्तिपात कर्म की अपेक्षा रखता है, लेकिन लोकोत्तर भोग की अभिलाषा जिनमें वर्तमान उनमें शक्तिपात परमेश्वर की इच्छा से प्रेरित मायागर्भ में अवस्थित रुद्र, विष्णु और ब्रह्मा आदि अधिकारी पुरुषों के द्वारा सम्पन्न होता है। मन्त्र आदि का स्वरूप प्राप्त करना, माया और पुरुष का विवेक, पुरुष और कला का विवेक, पुरुष प्रकृति विवेक, पुरुष और बुद्धि का विवेक आदि एवम् अन्य प्रकार फलों को उत्पन्न करते हुए शक्तिपात निम्नभूमि में स्थित तत्त्वों में भोग उत्पन्न करने में बाधा डालता है। भोग और मोक्ष उभय प्रकार फल के उत्सुक जीवों में जो भोग की अभिलाषा है उसमें कर्म की अपेक्षा रहती है, मोक्ष के प्रति अभिलाषा में कर्म की अपेक्षा नहीं रहती है। इसलिए शक्तिपात सापेक्ष-निरपेक्ष है। अब यह १. द्वैत आगमों के अनुसार ज्ञान अथवा कर्मसाम्य शक्तिपात का कारण नहीं हो सकता है, मलपाक ही शक्तिपात का हेतु है। मल द्रव्यरूप है। यह मल अनादि है, परन्तु सान्त है। यह क्रम से पक्व हो रहा है। जब मल पूर्णरूप से परिपक्व हो जाता है तब परमेश्वर दीक्षा के द्वारा उसे हटाते हैं। मल द्रव्यरूप होने के कारण परमेश्वर क्रियात्मक दीक्षा के द्वारा उसे हटाते हैं।