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तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

पृष्ठ 199, कुल 294 में से

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११८ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ११ कहना उचित नहीं है कहाँ से किसी एक विशेष जीव पर शक्तिपात होता है, क्योंकि वही परमेश्वर उस प्रकार से प्रकट होते हैं, वास्तविक तत्त्व इस प्रकार होने के कारण पुरुष नाम का वह कौन वस्तु हैं जिसके सम्बन्ध में विषय सम्बन्धी इतिकर्तव्यता का उपदेश हो । यह जो शक्तिपात का उल्लेख हुआ है वह नौ प्रकार हैं, जो तीव्र, मध्य और मन्द के भेदों से ये तीन क्रमशः उत्कृष्ट तीव्र, उत्कृष्ट मध्य, उत्कृष्ट मन्द, मध्य तीव्र, मध्य मध्य, मध्य मन्द, निकृष्ट तीव्र, निकृष्ट मध्य, निकृष्ट मन्द के भेदों से नौ प्रकार हैं। उनमें उत्कृष्ट-तीव्र शक्तिपात होनेपर उसी क्षण ही देहपात हो जाता है और परमेश्वरत्व की स्थिति आ जाती है। १ मध्यतीव्र शक्तिपात होने पर शास्त्र और आचार्य की अपेक्षा के बिना ही अपने बोधरूपी प्रातिभ- ज्ञान का उदय होता है, जिसके उदय के साथ किसी प्रकार बाहरी संस्कार के बिना ही भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाले उन्हें प्रातिभगुरु कहते हैं। इस प्रकार व्यक्ति को समयी के लिए आवश्यक कर्तव्यों की अपेक्षा नहीं रहती। इसमें भी इच्छा की विचित्रता के कारण प्रातिभत्व के बावजूद उनमें अपने विचार की सत्यता के लिए शास्त्र आदि की अपेक्षा हो सकती है। आगमों में प्रातिभ गुरु के निर्भित्तिक तथा सभित्तिक २ आदि नाना भेदों का वर्णन हुआ है। प्रतिभा का अंश सब प्रकार से बलवान है। प्रातिभगुरु के समीप अन्य सभी को अधिकार वर्जित है, भेदवादियों के सिद्धान्त के अनुसार

१. तीव्र-तीव्र शक्तिपात के प्रभाव से तत्काल देह छूट जाता है और मोक्ष अधिगत होता है, भोग के द्वारा प्रारब्धक्षय की अपेक्षा नहीं रहती। मध्यतीव्र शक्तिपात के प्रभाव से अज्ञान की निवृत्ति होती है, लेकिन इस अज्ञान निवृत्ति के लिए जिस ज्ञान की अपेक्षा है वह स्वयं हृदय में स्फुरित होता है। इसे ही प्रातिभज्ञान कहते हैं। २. ज्ञान के उदय के सम्बन्ध में एक बात ज्ञातव्य है। ज्ञान जब स्वतः ही हृदय में उदित होता है, किसी प्रकार शास्त्र या आचार्य की अपेक्षा नहीं रहती तब उस प्रकार ज्ञान को निर्भित्तिक ज्ञान कहते हैं। लेकिन दूसरे प्रकार के ज्ञान सभित्तिक है। सभित्तिक ज्ञान के उदय के लिए बाह्य उपकरणों की आवश्यकता रहती है।

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